मानव अधिकार – मुद्दे, चुनौतियाँ और समकालीन सरोकार:
विचाराधीन कैदी (Undertrials), कैदी (Prisoners) और युद्धबंदी (P.O.Ws)
(भारतीय एवं अंतरराष्ट्रीय संदर्भ)
विचाराधीन कैदियों, कैदियों और युद्धबंदियों की स्थिति मानव अधिकारों के प्रति किसी भी राज्य और समाज की वास्तविक प्रतिबद्धता की कसौटी मानी जाती है। ये वे व्यक्ति हैं जो राज्य की अभिरक्षा में स्वतंत्रता से वंचित हैं या युद्ध जैसी असाधारण परिस्थितियों में अत्यधिक असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। इनका व्यवहार यह दिखाता है कि मानव अधिकार केवल शांति और सामान्य परिस्थितियों में ही नहीं, बल्कि दंड, निरोध और सशस्त्र संघर्ष के समय भी कितने प्रभावी हैं।
इन समूहों से जुड़े प्रश्न न्याय, गरिमा, विधिक प्रक्रिया, राज्य शक्ति और मानवीय दायित्वों के मूल में स्थित हैं। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की नैतिकता का आकलन इस बात से किया जा सकता है कि वह सबसे कमज़ोर और निरुद्ध व्यक्तियों के साथ कैसा व्यवहार करती है।
स्वतंत्रता से वंचन और मानव अधिकार
स्वतंत्रता से वंचन का अर्थ मानव अधिकारों से वंचन नहीं होता। मानव अधिकार सिद्धांत यह मानता है कि दंड या निरोध की स्थिति में भी व्यक्ति की अंतर्निहित मानवीय गरिमा और मूल अधिकार सुरक्षित रहते हैं।
विचाराधीन कैदियों, कैदियों और युद्धबंदियों पर लागू प्रमुख मानव अधिकार हैं—
- जीवन और गरिमा का अधिकार
- यातना तथा क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार से संरक्षण
- निष्पक्ष सुनवाई और विधिक प्रक्रिया का अधिकार
- मानवीय निरोध और कारावास की परिस्थितियाँ
निरोध की स्थितियों में अधिकारों का उल्लंघन विशेष रूप से गंभीर होता है क्योंकि वहाँ राज्य का पूर्ण नियंत्रण होता है।
विचाराधीन कैदी: निर्दोषता की धारणा और मानव अधिकार
विचाराधीन कैदी वे होते हैं जिन पर आरोप तो लगाए गए हैं, परंतु जिनका दोष न्यायालय द्वारा सिद्ध नहीं हुआ है। मानव अधिकार दृष्टि से वे निर्दोषता की धारणा (Presumption of Innocence) के अधिकारी होते हैं।
भारत में विचाराधीन कैदियों की संख्या बहुत अधिक है, जिससे निम्न समस्याएँ उभरती हैं—
- दोषसिद्धि के बिना लंबे समय तक कारावास
- जाँच और मुक़दमे में अत्यधिक विलंब
- गरीबी और क़ानूनी सहायता के अभाव में ज़मानत न मिल पाना
- जेलों में भीड़ और अमानवीय परिस्थितियाँ
Constitution of India व्यक्तिगत स्वतंत्रता और विधिक प्रक्रिया की गारंटी देता है, फिर भी लंबा विचाराधीन कारावास अक्सर दोषसिद्धि के बिना दंड में बदल जाता है, जो मानव अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है।
कैदी: दंड, सुधार और गरिमा
कैदी वे व्यक्ति हैं जिन्हें न्यायालय द्वारा दोषी ठहराकर दंडित किया गया है। परंतु कारावास का अर्थ मानव अधिकारों का पूर्ण हनन नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में दंड का उद्देश्य केवल प्रतिशोध नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्वास भी होता है।
कैदियों से जुड़े प्रमुख मानव अधिकार सरोकार हैं—
- हिरासत में हिंसा और मृत्यु
- भीड़भाड़, स्वच्छता और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी
- पर्याप्त पोषण और चिकित्सा का अभाव
- क़ानूनी सहायता और पारिवारिक संपर्क में बाधा
Supreme Court of India ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि कैदी अपने मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं होते; केवल वही अधिकार सीमित होते हैं जो कारावास के लिए अनिवार्य हों। न्यायपालिका ने मानवीय व्यवहार, क़ानूनी सहायता और यातना से संरक्षण को कैदियों के अधिकारों का हिस्सा माना है।
जेलों में उल्लंघन: संरचनात्मक कारण
जेलों में मानव अधिकार उल्लंघन केवल व्यक्तिगत क्रूरता का परिणाम नहीं, बल्कि संरचनात्मक और संस्थागत विफलताओं से उत्पन्न होते हैं, जैसे—
- गरीबी का अपराधीकरण
- कारावास पर अत्यधिक निर्भरता
- अपर्याप्त अवसंरचना और स्टाफ
- बंदियों के प्रति सामाजिक पूर्वाग्रह
हाशिए पर स्थित समुदायों की जेलों में अधिक उपस्थिति यह दिखाती है कि मानव अधिकार उल्लंघन वर्ग, जाति और आर्थिक असमानता से भी जुड़े हैं।
युद्धबंदी (P.O.Ws): अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून
युद्धबंदी वे सैनिक होते हैं जो सशस्त्र संघर्ष के दौरान पकड़े जाते हैं। वे अपराधी नहीं, बल्कि युद्ध की स्थिति में लड़ाई से बाहर (hors de combat) हो चुके व्यक्ति होते हैं। उनकी सुरक्षा Geneva Conventions द्वारा सुनिश्चित की जाती है।
युद्धबंदियों के लिए प्रमुख अधिकार हैं—
- बिना भेदभाव के मानवीय व्यवहार
- यातना और हिंसा से संरक्षण
- परिवार से संपर्क का अधिकार
- सार्वजनिक अपमान और दमन से सुरक्षा
युद्धबंदियों के साथ दुर्व्यवहार अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन है और युद्ध अपराध की श्रेणी में आ सकता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा और अपवादवाद
विचाराधीन कैदियों, कैदियों और युद्धबंदियों के अधिकारों के संदर्भ में एक बड़ी चुनौती राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर अधिकारों का निलंबन है। आपातकाल, आतंकवाद या युद्ध की स्थिति में राज्य कठोर निरोध और पूछताछ को उचित ठहराते हैं।
मानव अधिकार दृष्टिकोण यह स्पष्ट करता है कि आपात स्थितियों में भी कुछ अधिकार—जैसे यातना से संरक्षण और मनमाने ढंग से जीवन से वंचन न किया जाना—अविच्छेद्य (non-derogable) होते हैं।
न्याय तक पहुँच और निगरानी तंत्र
निरोध में अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक हैं—
- स्वतंत्र न्यायिक निगरानी
- प्रभावी क़ानूनी प्रतिनिधित्व
- पारदर्शी जेल प्रशासन
- मानव अधिकार संस्थाओं द्वारा निरीक्षण
इन तंत्रों के अभाव में निरोध स्थल क़ानूनी अदृश्यता के क्षेत्र बन सकते हैं, जहाँ उल्लंघन दंडहीन रह जाते हैं।
समकालीन चुनौतियाँ
आज निरोध और कारावास से जुड़े मानव अधिकार सरोकार और तीव्र हुए हैं—
- अत्यधिक भीड़भाड़ और सामूहिक कारावास
- निवारक निरोध क़ानूनों का बढ़ता उपयोग
- आतंकवाद संबंधी मामलों में लंबी हिरासत
- असममित युद्धों में बंदियों की स्थिति
ये प्रवृत्तियाँ मानव अधिकारों के प्रति नए सिरे से प्रतिबद्धता की माँग करती हैं।
मानव अधिकार, लोकतंत्र और विधि का शासन
विचाराधीन कैदियों, कैदियों और युद्धबंदियों के साथ व्यवहार विधि के शासन की वास्तविक परीक्षा है। लोकतंत्र की पहचान इस बात से नहीं होती कि वह शक्तिशाली लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है, बल्कि इस बात से होती है कि वह निर्बल और निरुद्ध व्यक्तियों के अधिकारों की कैसे रक्षा करता है।
मानव अधिकार यह अपेक्षा करते हैं कि दंड और सुरक्षा उपाय क़ानून, अनुपातिकता और गरिमा की सीमाओं के भीतर हों।
निष्कर्ष
विचाराधीन कैदी, कैदी और युद्धबंदी मानव अधिकार परिदृश्य में सबसे अधिक असुरक्षित स्थिति में होते हैं, क्योंकि वे राज्य नियंत्रण और विवशता की दशा में रहते हैं। उनके अनुभव राज्य शक्ति और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच के तनाव को उजागर करते हैं।
भारतीय और वैश्विक अनुभव यह सिद्ध करता है कि मानव अधिकारों की वास्तविक परीक्षा संवैधानिक घोषणाओं में नहीं, बल्कि निरोध, दंड और संघर्ष की दैनिक प्रथाओं में होती है। इन समूहों के अधिकारों की रक्षा कोई उदारता नहीं, बल्कि संवैधानिक, क़ानूनी और नैतिक दायित्व है—जो न्याय, लोकतंत्र और मानवीय गरिमा के लिए अनिवार्य है।
संदर्भ (References)
- Constitution of India
- Baxi, Upendra. The Future of Human Rights
- Foucault, Michel. Discipline and Punish
- International Committee of the Red Cross. Commentary on the Geneva Conventions
- Supreme Court of India के जेल सुधार संबंधी निर्णय