वैश्वीकरण में राज्य की भूमिका: भारत और इज़राइल
(Role of the State in Globalization: India and Israel)
वैश्वीकरण ने राज्य, अर्थव्यवस्था और समाज के आपसी संबंधों को गहराई से रूपांतरित किया है। प्रारंभिक विमर्शों में यह माना गया कि वैश्वीकरण राज्य को कमजोर कर देता है, किंतु तुलनात्मक राजनीति का अध्ययन दर्शाता है कि वैश्वीकरण ने राज्य को अप्रासंगिक नहीं बनाया, बल्कि राज्य-सत्ता की भूमिका को पुनर्संरचित किया है। आज राज्य व्यापार, पूँजी, प्रौद्योगिकी, सुरक्षा और वैश्विक शासन के जटिल नेटवर्कों के भीतर कार्य करते हैं।
India और Israel के अनुभव यह दिखाते हैं कि ऐतिहासिक विरासत, राजनीतिक अर्थव्यवस्था और रणनीतिक संदर्भ के आधार पर राज्य वैश्वीकरण से भिन्न तरीकों से निपटते हैं।
यह इकाई भारत और इज़राइल में वैश्वीकरण के संदर्भ में राज्य की भूमिका का विश्लेषण करती है—आर्थिक सुधार, राज्य-क्षमता, वैश्विक एकीकरण तथा संप्रभुता और परस्पर-निर्भरता के बीच तनावों के संदर्भ में।
वैश्वीकरण और राज्य की बदलती भूमिका
वैश्वीकरण को प्रायः पूँजी, वस्तुओं, प्रौद्योगिकी और सूचना के सीमा-पार प्रवाह से जोड़ा जाता है। यद्यपि इससे राज्य की प्रत्यक्ष आर्थिक नियंत्रण-क्षमता सीमित होती है, पर राज्य अब भी नियामक, वार्ताकार और संकट-प्रबंधक के रूप में केंद्रीय बना रहता है।
मुख्य प्रश्न यह नहीं है कि राज्य पीछे हटता है या नहीं, बल्कि यह है कि राज्य कैसे अनुकूलन करता है।
भारत और इज़राइल इस अनुकूलन की दो अलग-अलग, किंतु तुलनीय, मिसालें हैं।
भारत: राज्य-नेतृत्वित विकास से वैश्विक एकीकरण तक
स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक भारत ने राज्य-नेतृत्वित और अंतर्मुखी विकास का मार्ग अपनाया। औद्योगिकीकरण, योजना और विनियमन में राज्य की प्रमुख भूमिका रही और वैश्विक एकीकरण सीमित था।
1990 के दशक की शुरुआत में आर्थिक संकट और वैश्विक दबावों के बीच भारत ने आर्थिक उदारीकरण अपनाया। उद्योग पर प्रत्यक्ष नियंत्रण घटा, विदेशी निवेश के लिए बाज़ार खोले गए और भारत वैश्विक व्यापार एवं वित्त में एकीकृत हुआ।
महत्वपूर्ण यह है कि भारत में वैश्वीकरण का अर्थ राज्य का लोप नहीं था। राज्य उत्पादक से नियामक और सहायक (facilitator) की भूमिका में रूपांतरित हुआ।
भारत में चयनात्मक वैश्वीकरण और असमान परिणाम
भारतीय राज्य ने वैश्वीकरण को चयनात्मक रूप से प्रबंधित किया। सूचना प्रौद्योगिकी, सेवाएँ और औषधि जैसे क्षेत्रों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए बढ़ावा दिया गया, जबकि कुछ क्षेत्रों को संरक्षण मिला।
इससे तीव्र आर्थिक वृद्धि हुई, पर असमान परिणाम भी सामने आए—क्षेत्रीय विषमताएँ, श्रम का अनौपचारिकीकरण और सामाजिक असमानता बढ़ी। राज्य के सामने वैश्विक प्रतिस्पर्धा और सामाजिक कल्याण के बीच संतुलन साधने की नई चुनौती खड़ी हुई।
इज़राइल: वैश्वीकरण, सुरक्षा और नवाचार राज्य
इज़राइल का वैश्वीकरण-पथ अलग रहा। आरंभ से ही प्रवासन, विदेशी सहायता और रणनीतिक गठबंधनों के माध्यम से वह वैश्विक नेटवर्कों से जुड़ा रहा। समय के साथ वैश्वीकरण प्रौद्योगिकी, सुरक्षा और नवाचार से गहराई से जुड़ गया।
इज़राइली राज्य ने शिक्षा, अनुसंधान और सैन्य–नागरिक तकनीकी संपर्कों में निवेश कर उच्च-प्रौद्योगिकी, निर्यात-उन्मुख अर्थव्यवस्था विकसित की। यहाँ राज्य पीछे नहीं हटा, बल्कि विकासात्मक और नवाचार-उन्मुख रूप में सक्रिय रहा।
इज़राइल में राज्य-क्षमता और रणनीतिक एकीकरण
इज़राइल में वैश्वीकरण ने कुछ क्षेत्रों में राज्य-क्षमता को मज़बूत किया, तो कुछ में सीमाएँ भी पैदा कीं। आर्थिक खुलापन बढ़ा, पर रणनीतिक क्षेत्रों में राज्य का हस्तक्षेप बना रहा।
सुरक्षा इज़राइल के वैश्विक एकीकरण का केंद्रीय आयाम रही। रक्षा, निगरानी और साइबर-सुरक्षा जैसे क्षेत्र प्रमुख निर्यात बने, जिससे वैश्वीकरण राष्ट्रीय सुरक्षा प्राथमिकताओं से जुड़ गया।
संप्रभुता, वैश्विक शासन और नीति-स्वायत्तता
दोनों देशों में वैश्वीकरण ने संप्रभुता और नीति-स्वायत्तता पर दबाव डाला। अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियम, वित्तीय बाज़ार और बहुपक्षीय संस्थाएँ घरेलू नीतियों को सीमित करती हैं।
भारत ने चयनात्मक सहभागिता, दक्षिण–दक्षिण सहयोग और नीति-लचीलापन बनाए रखने की कोशिश की। इज़राइल ने पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं और सुरक्षा नेटवर्कों से घनिष्ठ संरेखण कर वैश्वीकरण को रणनीतिक प्रभाव बढ़ाने के साधन के रूप में उपयोग किया।
दोनों ही मामलों में राज्य वैश्विक दबावों और घरेलू प्राथमिकताओं के बीच मध्यस्थ बना रहा।
सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव
वैश्वीकरण ने घरेलू राजनीति को भी पुनर्गठित किया। भारत में उदारीकरण, निजीकरण और कल्याण को लेकर बहसें तेज़ हुईं; राज्य से अपेक्षा रही कि वह खुली अर्थव्यवस्था के साथ समावेशन और संरक्षण भी सुनिश्चित करे।
इज़राइल में वैश्वीकरण ने असमानताओं और पहचान-राजनीति को तीव्र किया, साथ ही सुरक्षा-शासन में राज्य की भूमिका को मज़बूत किया। इस प्रकार वैश्वीकरण राजनीति को निष्क्रिय नहीं करता; वह अक्सर राजनीतिक संघर्षों को तीव्र करता है।
तुलनात्मक अंतर्दृष्टियाँ
- भारत में वैश्वीकरण धीरे-धीरे और चयनात्मक रहा; इज़राइल में प्रारंभिक और गहन
- भारत ने वृद्धि और सामाजिक समावेशन के संतुलन पर ज़ोर दिया; इज़राइल ने नवाचार और रणनीतिक बढ़त पर
- दोनों ही मामलों में राज्य केंद्रीय बना रहा, यद्यपि उसकी भूमिकाएँ पुनर्परिभाषित हुईं
निष्कर्ष: वैश्वीकृत दुनिया में राज्य
भारत और इज़राइल का अनुभव यह स्पष्ट करता है कि वैश्वीकरण राज्य-सत्ता को समाप्त नहीं करता; वह उसे पुनर्संरचित करता है। भारत में राज्य योजना-प्राधिकरण से नियामक और वैश्विक एकीकरण के प्रबंधक में बदला। इज़राइल में राज्य ने वैश्वीकरण का उपयोग नवाचार-आधारित और सुरक्षा-उन्मुख अर्थव्यवस्था बनाने में किया।
ये उदाहरण दिखाते हैं कि वैश्वीकरण कोई एकरूप प्रक्रिया नहीं है जो निष्क्रिय राज्यों पर थोप दी जाए; बल्कि यह राज्यों द्वारा सक्रिय रूप से गढ़ी गई प्रक्रिया है—जो इतिहास, संस्थागत क्षमता और राजनीतिक विकल्पों को प्रतिबिंबित करती है।
संदर्भ (References)
- Kohli, Atul. State-Directed Development
- Rodrik, Dani. The Globalization Paradox
- Evans, Peter. Embedded Autonomy
- Khilnani, Sunil. The Idea of India
- Sen, Amartya. Development as Freedom