प्रभुत्वशाली पुरुषत्व : राज्य और राष्ट्रवाद
(Hegemonic Masculinities: State and Nationalism)
प्रभुत्वशाली पुरुषत्व (Hegemonic Masculinity) की अवधारणा यह समझने का एक प्रभावशाली ढाँचा प्रदान करती है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों (IR) में राज्य और राष्ट्रवाद कैसे निर्मित, वैध और स्थायी बनाए जाते हैं। नारीवादी विद्वानों का तर्क है कि राज्य शक्ति और राष्ट्रवाद जेंडर-निरपेक्ष नहीं हैं, बल्कि वे उन प्रभुत्वशाली पुरुषवादी आदर्शों से गहराई से आकार लेते हैं जो शक्ति, नियंत्रण, बलिदान और आक्रामकता को महत्त्व देते हैं। ये आदर्श यह निर्धारित करते हैं कि राष्ट्र की ओर से कौन बोल सकता है, खतरों की कल्पना कैसे की जाती है, और राजनीतिक सत्ता का प्रयोग किस प्रकार होता है।
यह इकाई विश्लेषण करती है कि किस प्रकार प्रभुत्वशाली पुरुषत्व राज्य और राष्ट्रवादी परियोजनाओं के भीतर कार्य करता है और राजनीतिक पहचान, सुरक्षा प्रथाओं तथा संबद्धता (belonging) की अवधारणाओं को गढ़ता है।
प्रभुत्वशाली पुरुषत्व की अवधारणा
प्रभुत्वशाली पुरुषत्व उस प्रमुख और सामाजिक रूप से विशेषाधिकार प्राप्त पुरुषत्व को संदर्भित करता है, जो पुरुष प्रभुत्व को वैध ठहराता है और वैकल्पिक पुरुषत्वों तथा स्त्रीत्वों को अधीनस्थ बनाता है। यह सभी पुरुषों का वर्णन नहीं करता, बल्कि मर्दानगी के उस आदर्श मॉडल को दर्शाता है जो सत्ता, कठोरता, तर्कशीलता और विषमलैंगिकता से जुड़ा होता है।
R. W. Connell के कार्यों पर आधारित नारीवादी विद्वान यह स्पष्ट करते हैं कि प्रभुत्वशाली पुरुषत्व ऐतिहासिक रूप से निर्मित और राजनीतिक रूप से संरक्षित होता है। यह सेना, राज्य और राष्ट्रवादी आंदोलनों जैसी संस्थाओं के माध्यम से संचालित होता है और नेतृत्व व नागरिकता के मानदंडों को आकार देता है।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों में यही प्रभुत्वशाली पुरुषत्व राज्य की शक्ति, सुरक्षा और वैधता की समझ में अंतर्निहित हो जाता है।
पुरुषवादी संस्था के रूप में राज्य
आधुनिक राज्य को प्रायः एक पुरुषवादी इकाई के रूप में कल्पित किया जाता है—मज़बूत, स्वायत्त और अपनी सीमाओं की रक्षा करने में सक्षम। राजनीतिक सत्ता को निर्णायकता, भावनात्मक संयम और हिंसा की क्षमता से जोड़ा जाता है, जो सांस्कृतिक रूप से पुरुषत्व से संबद्ध माने जाते हैं।
नारीवादी विद्वानों का तर्क है कि राज्य की संस्थाएँ—नौकरशाही, सेना और कूटनीतिक ढाँचे—पुरुषवादी व्यवहारों को विशेषाधिकार देती हैं। कठोरता और नियंत्रण पर आधारित नेतृत्व शैलियों को पुरस्कृत किया जाता है, जबकि देखभाल, सहानुभूति और सहयोग जैसे गुण हाशिए पर चले जाते हैं।
इस प्रकार, राज्य का यह पुरुषीकरण राष्ट्रवादी विमर्श में कल्याण, देखभाल और सामाजिक पुनरुत्पादन पर आधारित राजनीति को कम वैध बनाता है।
राष्ट्रवाद और पुरुषवादी पहचान
राष्ट्रवाद गहराई से जेंडरयुक्त प्रतीकों पर निर्भर करता है। राष्ट्र को अक्सर मातृभूमि के रूप में स्त्रीकृत किया जाता है—जिसकी रक्षा की जानी है—जबकि रक्षक की भूमिका पुरुषीकृत होती है। पुरुषों को योद्धा और बलिदानी नागरिक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि स्त्रियों को प्रजनन, सांस्कृतिक संरक्षण और नैतिक शुद्धता से जोड़ा जाता है।
ये कथाएँ जेंडर पदानुक्रमों को स्वाभाविक बना देती हैं और उन्हें राष्ट्रीय अस्तित्व के लिए आवश्यक बताती हैं। युद्ध में पुरुष बलिदान को सच्ची नागरिकता का प्रतीक माना जाता है, जबकि अहिंसा या असहमति को स्त्रीलिंग और अवैध ठहराया जाता है।
इस प्रकार राष्ट्रवादी परियोजनाएँ निष्ठा जुटाने, जनसंख्या को अनुशासित करने और हिंसा को वैध ठहराने के लिए प्रभुत्वशाली पुरुषत्व पर निर्भर करती हैं।
सैन्यवाद, पुरुषत्व और राष्ट्रीय सम्मान
सैन्यवाद वह प्रमुख क्षेत्र है जहाँ प्रभुत्वशाली पुरुषत्व और राष्ट्रवाद का मिलन होता है। सैन्य संस्थाएँ साहस, अनुशासन और सहनशीलता जैसे आदर्शों को बढ़ावा देती हैं और पुरुषत्व को राष्ट्रीय सम्मान व सुरक्षा से जोड़ देती हैं।
Cynthia Enloe ने दिखाया है कि राष्ट्रवादी संस्कृतियाँ सैन्यीकृत पुरुषत्वों पर निर्भर करती हैं—जहाँ सैनिकों को राष्ट्र के रक्षक के रूप में और सैन्य शक्ति को राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इससे ऊँचे रक्षा व्यय और हिंसा को संप्रभुता की रक्षा का आवश्यक साधन मान लिया जाता है।
साथ ही, यह सैन्यीकृत राष्ट्रवाद उन सभी को हाशिए पर डाल देता है जो प्रभुत्वशाली पुरुषवादी आदर्शों के अनुरूप नहीं होते—जैसे स्त्रियाँ, लैंगिक अल्पसंख्यक और अहिंसक पुरुष।
बहिष्कार और प्रभुत्वशाली पुरुषत्व
प्रभुत्वशाली पुरुषत्व राष्ट्र के भीतर समावेशन और बहिष्कार की सीमाएँ तय करता है। केवल वही व्यक्ति पूर्ण राजनीतिक विषय के रूप में मान्यता पाते हैं जो प्रभुत्वशाली पुरुषवादी गुणों को धारण करते हैं। अल्पसंख्यक, असहमत आवाज़ें और गैर-मानक पुरुषत्वों को अक्सर कमज़ोर, अविश्वासी या राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा बताया जाता है।
संकट के समय यह प्रवृत्ति और तीव्र हो जाती है, जब राजनीतिक नेता “मज़बूत पुरुष” की छवि के माध्यम से विरोध को दबाते हैं और अधिनायकवादी कदमों को正 ठहराते हैं। इस प्रकार प्रभुत्वशाली पुरुषत्व लोकतांत्रिक सहभागिता की सीमाओं को भी संकुचित करता है।
उत्तर–औपनिवेशिक दृष्टिकोण : पुरुषत्व और राष्ट्रवाद
उत्तर–औपनिवेशिक नारीवादी विद्वान यह दिखाते हैं कि राष्ट्रवादी परियोजनाओं में प्रभुत्वशाली पुरुषत्व औपनिवेशिक इतिहासों से आकार लेता है। कई औपनिवेशिक-विरोधी आंदोलनों ने उपनिवेशी “नपुंसकीकरण” के प्रत्युत्तर में अतिपुरुषवादी (hypermasculine) राष्ट्रवाद को अपनाया।
यद्यपि इन पुरुषत्वों ने बाहरी प्रभुत्व को चुनौती दी, पर स्वतंत्रता के बाद उन्होंने पितृसत्तात्मक पदानुक्रमों को पुनः स्थापित किया। स्त्रियों का राष्ट्रवादी संघर्षों में योगदान अक्सर स्वतंत्रता के बाद अदृश्य कर दिया गया, क्योंकि पुरुष नेतृत्व को सामान्य मान लिया गया।
यह आलोचना राष्ट्रवाद को एक ऐसी जेंडरयुक्त परियोजना के रूप में उजागर करती है, जो बाहरी प्रभुत्व को चुनौती देते हुए भी आंतरिक असमानताओं को बनाए रखती है।
प्रभुत्वशाली पुरुषत्व को चुनौती देना
नारीवादी और आलोचनात्मक विद्वानों का तर्क है कि प्रभुत्वशाली पुरुषत्व न तो प्राकृतिक है और न ही अपरिहार्य। देखभाल, सहयोग और अहिंसा पर आधारित वैकल्पिक पुरुषत्व राज्य और राष्ट्रवाद की पुनर्कल्पना की संभावनाएँ प्रस्तुत करते हैं।
शांति आंदोलन, नारीवादी राजनीति और सामाजिक आंदोलनों ने सैन्यीकृत राष्ट्रवाद को चुनौती दी है और पुरुषत्व, हिंसा तथा राष्ट्रीय शक्ति के बीच स्थापित संबंधों पर प्रश्न उठाए हैं। ये हस्तक्षेप अधिक समावेशी और लोकतांत्रिक संबद्धता के लिए स्थान खोलते हैं।
निष्कर्ष : पुरुषत्व, सत्ता और राष्ट्र
प्रभुत्वशाली पुरुषत्व यह समझने के लिए केंद्रीय है कि राज्य और राष्ट्रवादी विचारधाराएँ कैसे कार्य करती हैं। यह राजनीतिक सत्ता को आकार देता है, हिंसा को वैध ठहराता है और नागरिकता की सीमाएँ निर्धारित करता है।
राज्य और राष्ट्रवाद की जेंडरयुक्त नींव को उजागर करके नारीवादी अंतरराष्ट्रीय संबंध यह स्पष्ट करता है कि ये संस्थाएँ न तो तटस्थ हैं और न ही सार्वभौमिक। प्रभुत्वशाली पुरुषत्व के लेंस से राष्ट्रवाद को देखने पर वह एक राजनीतिक–सांस्कृतिक परियोजना के रूप में सामने आता है, जो जेंडर आधारित सत्ता-संबंधों से संचालित होती है।
यह विश्लेषण न केवल वैश्विक राजनीति की हमारी समझ को गहरा करता है, बल्कि देखभाल, समावेशन और न्याय पर आधारित वैकल्पिक भविष्य की ओर भी संकेत करता है।
संदर्भ (References)
- कॉनेल, आर. डब्ल्यू., Masculinities
- एनलो, सिंथिया, Bananas, Beaches and Bases
- हूपर, चार्लोट, Manly States
- टिकनर, जे. ऐन, Gender in International Relations
- नेगल, जोएन, “Masculinity and Nationalism”