धर्म का दर्शन
बी. आर. आंबेडकर के बौद्धिक चिंतन में धर्म का दर्शन अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। पारंपरिक धार्मिक दार्शनिकों के विपरीत, जो ईश्वर, आत्मा या मोक्ष जैसे आध्यात्मिक प्रश्नों पर केंद्रित रहते हैं, आंबेडकर ने धर्म को मुख्यतः एक सामाजिक और नैतिक संस्था के रूप में समझा। उनके लिए धर्म का मूल प्रश्न यह नहीं था कि वह आध्यात्मिक रूप से सत्य है या नहीं, बल्कि यह था कि वह न्यायसंगत है या नहीं, तर्कसंगत है या नहीं, और क्या वह मानव गरिमा को बढ़ावा देता है।
आंबेडकर का धर्म-दर्शन जातिगत उत्पीड़न के उनके निजी अनुभवों और भारतीय तथा पाश्चात्य विचारधाराओं के गहन अध्ययन से विकसित हुआ। वे मानते थे कि धर्म सामाजिक संबंधों, नैतिक मूल्यों और सत्ता संरचनाओं को गहराई से प्रभावित करता है, इसलिए उसे विवेक और नैतिकता की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
धर्म एक सामाजिक संस्था के रूप में
आंबेडकर इस धारणा को अस्वीकार करते हैं कि धर्म केवल निजी आस्था या आध्यात्मिक विषय है। उनके अनुसार धर्म समाज की संरचना, आचार-विचार और शक्ति-संबंधों को आकार देता है। भारतीय संदर्भ में धर्म का उपयोग ऐतिहासिक रूप से जाति-व्यवस्था और सामाजिक बहिष्कार को वैध ठहराने के लिए किया गया है।
आंबेडकर के लिए किसी भी धर्म की कसौटी उसके सामाजिक परिणाम होते हैं। जो धर्म असमानता, भेदभाव या प्रभुत्व को पवित्र ठहराता है, वह एक नैतिक प्रणाली के रूप में असफल है। उनका स्पष्ट मत था कि धर्म का उद्देश्य समाज की सेवा करना होना चाहिए, न कि उसे जकड़ना। इसलिए धर्म का मूल्यांकन केवल पवित्र ग्रंथों के आधार पर नहीं, बल्कि मानव जीवन पर उसके प्रभाव के आधार पर किया जाना चाहिए।
इस समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण ने आंबेडकर को यह समझने में सहायता दी कि किस प्रकार धार्मिक सत्ता सामाजिक उत्पीड़न से जुड़ी हुई है। इसी आधार पर उन्होंने हिंदू धर्म की आलोचना एक सामाजिक व्यवस्था के रूप में की।
हिंदू धर्म और शास्त्रीय सत्ता की आलोचना
आंबेडकर का धर्म से सबसे गहरा और निर्णायक संवाद हिंदू धर्म की आलोचना के रूप में सामने आता है। उनके अनुसार हिंदू धर्म कोई एकीकृत धर्म नहीं, बल्कि नियमों और परंपराओं का ऐसा समूह है जो जाति-आधारित पदानुक्रम को संस्थागत बनाता है। मनुस्मृति जैसे ग्रंथों की उन्होंने तीखी आलोचना की, क्योंकि वे असमानता को दैवी स्वीकृति प्रदान करते हैं।
आंबेडकर ने शास्त्रों की निरपेक्ष सत्ता को चुनौती दी। उनका तर्क था कि कोई भी ग्रंथ, चाहे वह कितना ही प्राचीन या पूजनीय क्यों न हो, यदि वह समानता और न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है, तो वह नैतिक वैधता का दावा नहीं कर सकता। उनके अनुसार शास्त्रीय सत्ता को तर्क और नैतिकता के अधीन होना चाहिए।
यहाँ यह महत्वपूर्ण है कि आंबेडकर ने व्यक्तिगत आस्था का निषेध नहीं किया, बल्कि उन विश्वासों को अस्वीकार किया जो सामाजिक उत्पीड़न को正 ठहराते हैं। इस प्रकार उनकी आलोचना धर्मशास्त्रीय नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक थी।
तर्क, नैतिकता और अंधविश्वास का निषेध
आंबेडकर के धर्म-दर्शन की एक प्रमुख विशेषता है तर्क और नैतिक उत्तरदायित्व पर उनका ज़ोर। वे अंधविश्वास, कर्मकांड और रूढ़ियों के कट्टर आलोचक थे, क्योंकि ये प्रथाएँ प्रायः सामाजिक असमानताओं को बनाए रखने का साधन बन जाती हैं।
उनके अनुसार धर्म को तर्कसंगत होना चाहिए। यदि कोई धार्मिक सिद्धांत विवेक या नैतिक चेतना के विरुद्ध है, तो उसे सुधारना या त्याग देना चाहिए। इस दृष्टि से आंबेडकर का चिंतन प्रबोधनकालीन (Enlightenment) परंपरा से जुड़ता है, किंतु वह भारतीय सामाजिक यथार्थ में गहराई से निहित है।
आंबेडकर मानते थे कि नैतिकता केवल ईश्वरीय आदेशों से उत्पन्न नहीं होती। नैतिक मूल्यों का मूल्यांकन मानव कल्याण और सामाजिक परिणामों के आधार पर होना चाहिए। इसलिए धर्म को समय और समाज की नैतिक प्रगति के अनुरूप विकसित होना चाहिए।
बौद्ध धर्म : एक नैतिक और तर्कसंगत धर्म
समानता और विवेक पर आधारित धर्म की खोज अंततः आंबेडकर को बौद्ध धर्म की ओर ले गई। उन्होंने बौद्ध धर्म को किसी रहस्यवादी या पारलौकिक दर्शन के रूप में नहीं, बल्कि एक नैतिक और सामाजिक दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया, जिसका केंद्र मानव दुःख और उसका निवारण है।
आंबेडकर की व्याख्या में धम्म करुणा, अहिंसा, तर्क, समानता और सामाजिक उत्तरदायित्व पर आधारित नैतिक नियम है। बौद्ध धर्म सृष्टिकर्ता ईश्वर की अवधारणा को अस्वीकार करता है और मानव कर्म तथा विवेक पर बल देता है, जिससे वह लोकतांत्रिक और समतावादी मूल्यों के अनुकूल बनता है।
आंबेडकर का बौद्ध धर्म स्वीकार करना केवल धार्मिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि एक सचेत दार्शनिक और नैतिक निर्णय था। यह उस धर्म से असहमति का प्रतीक था जो असमानता को बनाए रखता है, और उस धर्म की स्वीकृति का जो मानव गरिमा की पुष्टि करता है। उनके लिए धर्मांतरण आत्मसम्मान और सामूहिक मुक्ति का कार्य था।
धर्म और सामाजिक मुक्ति
आंबेडकर धर्म को सामाजिक मुक्ति का साधन मानते थे। वे उन धर्मों के कट्टर आलोचक थे जो पदानुक्रम और शोषण को बनाए रखते हैं, लेकिन वे धर्म के पूर्ण निषेध के पक्षधर नहीं थे। इसके बजाय वे ऐसे धर्म की परिकल्पना करते हैं जो नैतिक आचरण, सामाजिक एकता और सुधार को प्रेरित करे।
उनके अनुसार धर्म का उद्देश्य स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को बढ़ावा देना होना चाहिए। धर्म को अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध की चेतना विकसित करनी चाहिए और व्यक्ति में सामाजिक उत्तरदायित्व का भाव उत्पन्न करना चाहिए। जो धर्म इन मूल्यों को पूरा नहीं करता, वह अपनी नैतिक सत्ता खो देता है।
इस दृष्टि से आंबेडकर धर्म को अपने व्यापक लोकतांत्रिक और सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से जोड़ते हैं। धर्म राजनीति का विरोधी नहीं है, लेकिन उसे संवैधानिक और नैतिक मूल्यों के अनुरूप होना चाहिए।
निष्कर्ष : धर्म की नैतिक कसौटी
आंबेडकर का धर्म-दर्शन समाज में धर्म की भूमिका का एक क्रांतिकारी पुनर्मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। वे धर्म को आध्यात्मिक रहस्यवाद से निकालकर सामाजिक नैतिकता के क्षेत्र में स्थापित करते हैं। अंध आस्था के स्थान पर विवेक, शास्त्रीय सत्ता के स्थान पर मानव गरिमा और धार्मिक परंपरा के स्थान पर नैतिक न्याय को केंद्र में रखते हैं।
आंबेडकर के लिए धर्म की अंतिम कसौटी स्पष्ट और गहन है—
क्या वह समानता और मानव गरिमा की रक्षा करता है?
यदि नहीं, तो उसे सुधारना या त्याग देना नैतिक कर्तव्य है। धर्म, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय पर समकालीन बहसों में आंबेडकर का यह दृष्टिकोण आज भी अत्यंत प्रासंगिक बना हुआ है।
संदर्भ (References)
- आंबेडकर, बी. आर., जाति का विनाश (Annihilation of Caste)
- आंबेडकर, बी. आर., हिंदू धर्म का दर्शन (Philosophy of Hinduism)
- आंबेडकर, बी. आर., बुद्ध और उनका धम्म (Buddha and His Dhamma)
- ओमवेट, गेल, बुद्ध से आंबेडकर तक: जाति की समझ
- ज़ेलियट, एलेनोर, आंबेडकर का धर्मांतरण
- तेलतुम्बड़े, आनंद, रिपब्लिक ऑफ़ कास्ट