पहचान और मान्यता की राजनीति (Politics of Recognition)
समकालीन राजनीतिक सिद्धांत में पहचान (Identity) और मान्यता (Recognition) के प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो गए हैं। आधुनिक राजनीति अब केवल संसाधनों के वितरण (redistribution) या औपचारिक समानता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन समूहों और व्यक्तियों की पहचान से भी जुड़ी है जिन्हें लंबे समय तक अनदेखा, अपमानित या गलत रूप में प्रस्तुत किया गया। इस प्रकार की राजनीति को सामान्यतः “मान्यता की राजनीति (Politics of Recognition)” कहा जाता है।

मान्यता की राजनीति इस विचार पर आधारित है कि अन्याय केवल आर्थिक (economic) नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक (symbolic) भी होता है। जब किसी व्यक्ति या समूह की पहचान को नकारा जाता है या विकृत किया जाता है, तो यह उनकी गरिमा और आत्मसम्मान को गंभीर क्षति पहुँचाता है। इसी कारण यह विषय Debates in Political Theory (DU MA Political Science) में एक केंद्रीय बहस के रूप में उभरा है।
वैचारिक पृष्ठभूमि: पहचान और मान्यता
पहचान (Identity) से आशय उस तरीके से है जिससे व्यक्ति स्वयं को समझता है और समाज उसे समझता है। पहचान व्यक्तिगत भी होती है और सामूहिक भी, जो सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भों से निर्मित होती है। राजनीतिक सिद्धांतकारों के अनुसार पहचान अकेले नहीं बनती, बल्कि यह दूसरों के साथ संवाद और मान्यता के माध्यम से विकसित होती है।
मान्यता (Recognition) का अर्थ है किसी व्यक्ति या समूह की गरिमा, मूल्य और विशिष्टता को स्वीकार करना। जब यह मान्यता नहीं मिलती, तो व्यक्ति को हीनता और अपमान का अनुभव होता है। इसलिए मान्यता केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि एक मूलभूत मानवीय आवश्यकता है।
चार्ल्स टेलर (Charles Taylor) और मान्यता की राजनीति
चार्ल्स टेलर को मान्यता की राजनीति का प्रमुख सिद्धांतकार माना जाता है। टेलर का तर्क है कि आधुनिक समाज में पहचान का निर्माण प्रामाणिकता (authenticity) के नैतिक आदर्श से जुड़ा हुआ है। व्यक्ति तभी स्वयं के प्रति सच्चा हो सकता है जब उसकी पहचान को दूसरों द्वारा मान्यता मिले।
टेलर दो ऐतिहासिक परिवर्तनों की चर्चा करते हैं। पहला, सम्मान (honour) से गरिमा (dignity) की ओर संक्रमण, जहाँ सभी व्यक्तियों को समान मूल्यवान माना जाने लगा। दूसरा, अंतर-आधारित मान्यता (difference-based recognition) का उदय, जहाँ विशिष्ट सांस्कृतिक और सामूहिक पहचानों को स्वीकार करने की माँग बढ़ी।
टेलर के अनुसार, उदारवादी राज्य को केवल तटस्थ (neutral) नहीं रहना चाहिए, बल्कि सांस्कृतिक विविधता को सक्रिय रूप से मान्यता देनी चाहिए। मान्यता का अभाव वे एक प्रकार का उत्पीड़न (oppression) मानते हैं।
एक्सेल होनैथ (Axel Honneth): मान्यता और सामाजिक न्याय
एक्सेल होनैथ मान्यता को सामाजिक न्याय के केंद्र में रखते हैं। वे मान्यता को तीन क्षेत्रों में विभाजित करते हैं:
व्यक्तिगत संबंधों में प्रेम (love),
कानूनी क्षेत्र में अधिकार (rights),
और सामाजिक क्षेत्र में सम्मान या प्रतिष्ठा (social esteem)।
होनैथ के अनुसार, सामाजिक संघर्ष तब उत्पन्न होते हैं जब व्यक्ति या समूह इन क्षेत्रों में मान्यता से वंचित होते हैं। वे मानते हैं कि मान्यता के लिए संघर्ष (struggles for recognition) ही समाज में नैतिक प्रगति का प्रमुख स्रोत है।
मान्यता की राजनीति बनाम पुनर्वितरण की राजनीति
समकालीन राजनीतिक सिद्धांत की एक प्रमुख बहस मान्यता (recognition) और पुनर्वितरण (redistribution) के बीच है। इस बहस को विशेष रूप से नैन्सी फ्रेज़र (Nancy Fraser) ने आगे बढ़ाया।
फ्रेज़र का तर्क है कि केवल पहचान और संस्कृति पर ध्यान केंद्रित करने से आर्थिक असमानता और वर्गीय शोषण के प्रश्न पीछे छूट जाते हैं। वे न्याय का एक द्वि-आयामी सिद्धांत (two-dimensional theory of justice) प्रस्तुत करती हैं, जिसमें आर्थिक पुनर्वितरण और सांस्कृतिक मान्यता दोनों आवश्यक हैं।
उदार बहुसांस्कृतिकता और समूह अधिकार
मान्यता की राजनीति ने बहुसांस्कृतिकता (multiculturalism) और समूह-आधारित अधिकारों (group-differentiated rights) की बहस को भी प्रभावित किया है। विल काइम्लिका (Will Kymlicka) जैसे विचारक तर्क देते हैं कि अल्पसंख्यक सांस्कृतिक समूहों को अपनी पहचान बनाए रखने के लिए विशेष अधिकारों की आवश्यकता होती है।
इस दृष्टिकोण में मान्यता को भाषा अधिकारों, सांस्कृतिक स्वायत्तता और आरक्षण जैसी नीतियों के माध्यम से संस्थागत रूप दिया जाता है। यहाँ समानता का अर्थ समान व्यवहार नहीं, बल्कि प्रासंगिक भिन्नताओं को स्वीकार करना है।
मान्यता की राजनीति की आलोचना
मान्यता की राजनीति की आलोचना यह कहकर की जाती है कि यह समाज को खंडित (fragmented) कर सकती है और सामूहिक एकता को कमजोर कर सकती है। कुछ आलोचक मानते हैं कि पहचान-आधारित राजनीति पहचान को स्थिर और संकीर्ण बना देती है।
मार्क्सवादी और गणतांत्रिक विचारक यह भी तर्क देते हैं कि केवल मान्यता पर ज़ोर देने से आर्थिक शोषण और सत्ता संरचनाओं (power structures) की अनदेखी होती है।
पहचान, शक्ति और वर्चस्व
नारीवादी और उपनिवेशोत्तर (postcolonial) सिद्धांतकार इस बात पर ज़ोर देते हैं कि मान्यता हमेशा शक्ति संबंधों से जुड़ी होती है। कई बार प्रभुत्वशाली समूह ही यह तय करते हैं कि किस पहचान को कैसे मान्यता दी जाएगी।
यदि शक्ति असमानताओं को चुनौती नहीं दी जाए, तो मान्यता मुक्ति के बजाय नियंत्रण का माध्यम बन सकती है।
समकालीन प्रासंगिकता (Contemporary Relevance)
आज जाति, लैंगिक पहचान, LGBTQ+ अधिकार, आदिवासी अधिकार, धार्मिक अल्पसंख्यक और राष्ट्रवाद से जुड़े विवाद मान्यता की राजनीति के जीवंत उदाहरण हैं। भारत जैसे विविध समाज में यह बहस विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष (Conclusion)
पहचान और मान्यता की राजनीति ने राजनीतिक सिद्धांत को एक नई दिशा दी है। यह दिखाती है कि न्याय केवल संसाधनों के वितरण का प्रश्न नहीं, बल्कि गरिमा, सम्मान और सामाजिक दृश्यता का भी प्रश्न है। यद्यपि इसकी सीमाएँ हैं, फिर भी विविध और लोकतांत्रिक समाजों में मान्यता की राजनीति को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
FAQs
Q1. मान्यता की राजनीति क्या है?
पहचान और गरिमा की स्वीकृति के लिए राजनीतिक संघर्ष।
Q2. इस अवधारणा को किसने लोकप्रिय बनाया?
चार्ल्स टेलर।
Q3. मान्यता और पुनर्वितरण में क्या अंतर है?
मान्यता सांस्कृतिक अन्याय पर, पुनर्वितरण आर्थिक असमानता पर केंद्रित है।
Q4. नैन्सी फ्रेज़र का मुख्य योगदान क्या है?
मान्यता और पुनर्वितरण को जोड़ने का सिद्धांत।
Q5. पहचान आधुनिक राजनीति में क्यों महत्वपूर्ण है?
क्योंकि गलत मान्यता सामाजिक बहिष्कार और उत्पीड़न को जन्म देती है।