वैश्विक न्याय : थॉमस पॉग्गे का दृष्टिकोण
परिचय (Introduction)
समकालीन राजनीतिक सिद्धांत में वैश्विक न्याय (Global Justice) की बहस वैश्वीकरण (globalization), अंतरराष्ट्रीय असमानता, गरीबी और वैश्विक संस्थाओं की भूमिका के साथ तेज़ी से उभरी है। पारंपरिक राजनीतिक सिद्धांत मुख्यतः न्याय को राष्ट्र-राज्य (nation-state) की सीमाओं के भीतर ही समझते थे। लेकिन Thomas Pogge जैसे विचारकों ने यह तर्क दिया कि न्याय के सिद्धांतों को वैश्विक स्तर पर भी लागू किया जाना चाहिए।

पॉग्गे का योगदान विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि वे वैश्विक गरीबी को दान (charity) या मानवीय सहायता (humanitarian aid) की समस्या नहीं मानते, बल्कि इसे अन्यायपूर्ण वैश्विक संस्थागत ढाँचे (unjust global institutional order) का परिणाम मानते हैं। उनके अनुसार अमीर देश और वैश्विक संस्थाएँ गरीबी को बनाए रखने में सक्रिय भूमिका निभाती हैं।
वैचारिक पृष्ठभूमि: घरेलू न्याय से वैश्विक न्याय तक
परंपरागत राजनीतिक सिद्धांतों में न्याय को नागरिकों के बीच सहयोग और साझा संस्थाओं तक सीमित माना गया। सामाजिक अनुबंध सिद्धांत (social contract theory) भी न्याय को राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर रखता है। लेकिन वैश्वीकरण ने इस दृष्टिकोण को चुनौती दी।
आज अंतरराष्ट्रीय व्यापार, वैश्विक बाज़ार, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ दुनिया भर के लोगों के जीवन अवसरों (life chances) को प्रभावित करती हैं। इसीलिए वैश्विक न्याय का प्रश्न यह पूछता है कि क्या न्याय के सिद्धांत केवल नागरिकों के लिए हैं या सभी मनुष्यों के लिए।
थॉमस पॉग्गे और रॉल्सीय परंपरा (Rawlsian Framework)
थॉमस पॉग्गे का विचार John Rawls से गहराई से प्रभावित है, विशेषकर A Theory of Justice से। लेकिन वे रॉल्स की पुस्तक The Law of Peoples की आलोचना करते हैं। रॉल्स अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न्याय को सीमित रखते हुए केवल मानवीय सहायता (duty of assistance) की बात करते हैं।
पॉग्गे इस दृष्टिकोण को अपर्याप्त मानते हैं। उनके अनुसार जब वैश्विक संस्थाएँ आर्थिक परिणामों को गहराई से प्रभावित करती हैं, तब उन्हें भी न्याय के मानदंडों पर परखा जाना चाहिए। इस प्रकार पॉग्गे रॉल्स की घरेलू-केंद्रित न्याय अवधारणा का विस्तार वैश्विक स्तर तक करते हैं।
नकारात्मक कर्तव्य (Negative Duties) और संस्थागत क्षति
पॉग्गे के सिद्धांत का केंद्रीय विचार है नकारात्मक कर्तव्य (negative duties)। वे सकारात्मक कर्तव्य (positive duties) और नकारात्मक कर्तव्य के बीच अंतर करते हैं। सकारात्मक कर्तव्य का अर्थ है दूसरों की मदद करना, जबकि नकारात्मक कर्तव्य का अर्थ है दूसरों को नुकसान न पहुँचाना।
पॉग्गे तर्क देते हैं कि अमीर देश और समाज वैश्विक संस्थागत व्यवस्था में भाग लेकर नकारात्मक कर्तव्यों का उल्लंघन करते हैं। यह व्यवस्था ऐसी है जो पूर्वानुमेय (foreseeable) और टालने योग्य (avoidable) तरीकों से वैश्विक गरीबी को बनाए रखती है। इसलिए वैश्विक गरीबी केवल दुर्भाग्य नहीं, बल्कि अन्याय का परिणाम है।
वैश्विक संस्थागत व्यवस्था और गरीबी
पॉग्गे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि दुनिया में संसाधनों की कमी नहीं है, बल्कि समस्या उनके वितरण की है। वे अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों, वित्तीय प्रणालियों और बौद्धिक संपदा कानूनों (intellectual property rights) को गरीबी के प्रमुख कारण मानते हैं।
उनका प्रसिद्ध तर्क “संसाधन विशेषाधिकार (resource privilege)” से जुड़ा है। इसके अनुसार कोई भी सत्ता में आई सरकार—चाहे वह लोकतांत्रिक हो या तानाशाही—अपने देश के प्राकृतिक संसाधनों को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में बेच सकती है। इससे भ्रष्ट शासनों को बढ़ावा मिलता है और आम जनता संसाधनों के लाभ से वंचित रह जाती है।
मानवाधिकार और वैश्विक न्याय
पॉग्गे वैश्विक न्याय को मानवाधिकार (human rights) से जोड़ते हैं, विशेषकर सामाजिक-आर्थिक अधिकारों से। उनके अनुसार अत्यधिक गरीबी जीवन, भोजन, स्वास्थ्य और आवास जैसे मूल मानवाधिकारों का उल्लंघन है।
वे मानवाधिकारों की ज़िम्मेदारी केवल राष्ट्रीय सरकारों तक सीमित नहीं रखते। चूँकि वैश्विक संस्थाएँ राष्ट्रीय नीतियों को प्रभावित करती हैं, इसलिए वैश्विक स्तर पर भी मानवाधिकार उल्लंघनों की ज़िम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
हेल्थ इम्पैक्ट फंड (Health Impact Fund)
पॉग्गे का सिद्धांत केवल नैतिक आलोचना तक सीमित नहीं है। उन्होंने व्यावहारिक समाधान भी सुझाए हैं। Health Impact Fund (HIF) इसका प्रमुख उदाहरण है। इसका उद्देश्य दवा कंपनियों को गरीब देशों की बीमारियों के लिए दवाइयाँ विकसित करने हेतु प्रोत्साहित करना है।
इस योजना में कंपनियों को मुनाफ़ा बिक्री के बजाय स्वास्थ्य प्रभाव (health impact) के आधार पर मिलता है। यह प्रस्ताव दिखाता है कि पॉग्गे संरचनात्मक सुधार (institutional reform) को वैश्विक न्याय का वास्तविक रास्ता मानते हैं।
पॉग्गे के सिद्धांत की आलोचना
पॉग्गे के सिद्धांत की कई आलोचनाएँ की गई हैं। कुछ विद्वान कहते हैं कि वे घरेलू कारणों—जैसे भ्रष्टाचार, खराब शासन और नीतिगत असफलताओं—को कम महत्व देते हैं। उनके अनुसार गरीबी के लिए केवल वैश्विक संस्थाओं को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
अन्य आलोचक यह प्रश्न उठाते हैं कि नकारात्मक कर्तव्यों पर आधारित नैतिकता क्या पर्याप्त है। इसके अलावा, वैश्विक सुधारों की व्यवहारिकता (feasibility) पर भी संदेह व्यक्त किया जाता है।
प्रत्युत्तर और समर्थन
पॉग्गे इन आलोचनाओं का उत्तर देते हुए स्वीकार करते हैं कि घरेलू कारक भी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे तर्क देते हैं कि वैश्विक संस्थाएँ राष्ट्रीय विकल्पों को सीमित करती हैं। यदि नुकसान आंशिक रूप से भी वैश्विक व्यवस्था से हो रहा है, तो नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है।
उनके समर्थकों के अनुसार नकारात्मक कर्तव्य का तर्क अधिक मजबूत है क्योंकि यह दया नहीं, बल्कि न्याय की माँग करता है।
समकालीन प्रासंगिकता (Contemporary Relevance)
आज के संदर्भ में पॉग्गे का सिद्धांत जलवायु न्याय (climate justice), वैश्विक स्वास्थ्य, वैक्सीन असमानता और ऋण संकट जैसे मुद्दों में अत्यंत प्रासंगिक है। कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारियों ने वैश्विक संस्थागत असमानताओं को और उजागर किया है।
निष्कर्ष (Conclusion)
थॉमस पॉग्गे का वैश्विक न्याय सिद्धांत आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत में एक शक्तिशाली हस्तक्षेप है। वे वैश्विक गरीबी को अन्यायपूर्ण संस्थागत संरचनाओं का परिणाम मानते हैं और अमीर समाजों की नैतिक ज़िम्मेदारी को स्पष्ट करते हैं। नकारात्मक कर्तव्यों और संस्थागत सुधारों पर उनका ज़ोर वैश्विक न्याय की बहस को दान से न्याय की ओर ले जाता है।
FAQs
Q1. पॉग्गे के अनुसार वैश्विक गरीबी का मुख्य कारण क्या है?
अन्यायपूर्ण वैश्विक संस्थागत व्यवस्था।
Q2. नकारात्मक कर्तव्य का क्या अर्थ है?
दूसरों को नुकसान न पहुँचाने का नैतिक दायित्व।
Q3. पॉग्गे रॉल्स से कैसे अलग हैं?
रॉल्स न्याय को राज्यों तक सीमित रखते हैं, पॉग्गे उसे वैश्विक स्तर तक ले जाते हैं।
Q4. संसाधन विशेषाधिकार क्या है?
अवैध सरकारों को भी संसाधन बेचने की अनुमति देना।
Q5. पॉग्गे का सिद्धांत आज क्यों महत्वपूर्ण है?
यह वैश्विक असमानता और मानवाधिकार उल्लंघनों को समझने में मदद करता है।