नकारात्मक और सकारात्मक स्वतंत्रता : आइज़ाया बर्लिन और जेराल्ड मैकैलम
परिचय (Introduction)
स्वतंत्रता (liberty) राजनीतिक सिद्धांत की सबसे केंद्रीय अवधारणाओं में से एक है। आधुनिक राजनीतिक चिंतन में स्वतंत्रता को लेकर सबसे प्रभावशाली बहस नकारात्मक स्वतंत्रता (negative liberty) और सकारात्मक स्वतंत्रता (positive liberty) के बीच मानी जाती है। इस बहस को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करने का श्रेय आइज़ाया बर्लिन (Isaiah Berlin) को जाता है, जिन्होंने अपने प्रसिद्ध निबंध Two Concepts of Liberty (1969) में इन दोनों अवधारणाओं को स्पष्ट रूप से अलग किया।

बाद में जेराल्ड सी. मैकैलम जूनियर (Gerald C. MacCallum Jr.) ने इस विभाजन की आलोचना करते हुए यह तर्क दिया कि स्वतंत्रता की सभी अवधारणाएँ एक ही मूल संरचना (triadic structure) पर आधारित होती हैं। यह बहस MA Political Science (DU) के पाठ्यक्रम में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह राज्य, व्यक्ति, अधिकार, हस्तक्षेप और सामाजिक न्याय जैसे विषयों की सैद्धांतिक नींव को स्पष्ट करती है।
स्वतंत्रता की अवधारणा : सैद्धांतिक पृष्ठभूमि (Conceptual Background)
राजनीतिक सिद्धांत में स्वतंत्रता को सामान्यतः इस प्रश्न के माध्यम से समझा जाता है कि व्यक्ति किस हद तक बिना बाधा (constraint) के कार्य कर सकता है। शास्त्रीय उदारवाद (classical liberalism) में स्वतंत्रता का अर्थ मुख्यतः राज्य के हस्तक्षेप की अनुपस्थिति था, जैसा कि जॉन लॉक और जॉन स्टुअर्ट मिल के विचारों में दिखाई देता है।
बीसवीं शताब्दी में यह स्पष्ट हुआ कि केवल कानूनी हस्तक्षेप की अनुपस्थिति पर्याप्त नहीं है, क्योंकि सामाजिक, आर्थिक और मानसिक बाधाएँ भी व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर सकती हैं। इसी संदर्भ में negative liberty और positive liberty का सैद्धांतिक विभाजन उभरा।
आइज़ाया बर्लिन की नकारात्मक स्वतंत्रता (Negative Liberty)
आइज़ाया बर्लिन के अनुसार नकारात्मक स्वतंत्रता का अर्थ है—बिना बाहरी हस्तक्षेप (external interference) के कार्य करने की स्वतंत्रता। कोई व्यक्ति तब स्वतंत्र माना जाता है जब राज्य, कानून या अन्य व्यक्ति उसके कार्यों में बाधा न डालें।
बर्लिन के लिए स्वतंत्रता का यह रूप उदार लोकतंत्र (liberal democracy) की बुनियाद है। वे मानते हैं कि स्वतंत्रता को इस आधार पर मापा जाना चाहिए कि व्यक्ति के लिए कितना क्षेत्र (area) खुला छोड़ा गया है, जहाँ वह बिना रोक-टोक के कार्य कर सके।
यह दृष्टिकोण जॉन स्टुअर्ट मिल के harm principle से जुड़ा हुआ है, जिसके अनुसार राज्य तभी हस्तक्षेप कर सकता है जब किसी व्यक्ति की क्रिया दूसरों को हानि पहुँचाती हो।
सकारात्मक स्वतंत्रता : आत्म-नियंत्रण और स्व-शासन (Positive Liberty)
सकारात्मक स्वतंत्रता का अर्थ है—स्वयं का स्वामी होना (self-mastery)। यह इस प्रश्न से जुड़ी है कि व्यक्ति अपने जीवन के निर्णय स्वयं ले रहा है या किसी अन्य शक्ति द्वारा नियंत्रित है।
बर्लिन बताते हैं कि यह विचार परंपरागत रूप से रूसो, कांट और हेगेल जैसे दार्शनिकों से जुड़ा हुआ है। सकारात्मक स्वतंत्रता में व्यक्ति को तभी स्वतंत्र माना जाता है जब वह अपने तर्कसंगत और नैतिक आत्म (rational self) के अनुसार जीवन जी रहा हो।
राजनीतिक स्तर पर यह अवधारणा लोकतांत्रिक भागीदारी, सामूहिक आत्म-शासन और सामाजिक सुधारों को वैध ठहराती है।
बर्लिन की सकारात्मक स्वतंत्रता पर आलोचना
आइज़ाया बर्लिन सकारात्मक स्वतंत्रता के राजनीतिक प्रयोग को लेकर अत्यंत सतर्क थे। उनका तर्क था कि जब स्वतंत्रता को “सच्चे आत्म” (true self) के अनुसार परिभाषित किया जाता है, तब यह खतरा पैदा होता है कि कोई अन्य शक्ति यह तय करे कि व्यक्ति का सच्चा हित क्या है।
इस तर्क के आधार पर बर्लिन कहते हैं कि व्यक्ति को “स्वतंत्र बनाने” के नाम पर उस पर बल प्रयोग (coercion) किया जा सकता है। इतिहास में कई अधिनायकवादी (totalitarian) व्यवस्थाओं ने इसी तर्क का प्रयोग किया। इसीलिए बर्लिन नकारात्मक स्वतंत्रता को अधिक सुरक्षित और उदार मानते हैं।
मैकैलम की स्वतंत्रता की त्रिकोणीय संरचना (MacCallum’s Triadic Formula)
जेराल्ड मैकैलम ने नकारात्मक और सकारात्मक स्वतंत्रता के बीच कठोर विभाजन को अस्वीकार किया। उनके अनुसार स्वतंत्रता की हर अवधारणा में तीन तत्व होते हैं:
X (व्यक्ति) Y (बाधाओं) से मुक्त होकर Z (किसी लक्ष्य) को प्राप्त करता है।
मैकैलम का तर्क है कि विवाद इस बात पर नहीं है कि स्वतंत्रता क्या है, बल्कि इस पर है कि बाधाएँ (constraints) क्या मानी जाएँ। नकारात्मक स्वतंत्रता बाहरी बाधाओं पर ध्यान देती है, जबकि सकारात्मक स्वतंत्रता आंतरिक और सामाजिक बाधाओं को भी शामिल करती है।
बर्लिन और मैकैलम : तुलनात्मक दृष्टि
जहाँ बर्लिन स्वतंत्रता की दो अलग-अलग अवधारणाओं पर जोर देते हैं, वहीं मैकैलम उन्हें एक ही अवधारणा के विभिन्न रूप मानते हैं। बर्लिन का दृष्टिकोण ऐतिहासिक और नैतिक चेतावनी देता है, जबकि मैकैलम का दृष्टिकोण विश्लेषणात्मक और सैद्धांतिक है।
DU की परीक्षाओं में अक्सर यह पूछा जाता है कि क्या मैकैलम का दृष्टिकोण बर्लिन की चिंताओं को पूरी तरह संबोधित करता है—जिसका उत्तर आलोचनात्मक विश्लेषण के साथ देना होता है।
आलोचना और प्रत्यालोचना (Criticism and Counter-Criticism)
बर्लिन की आलोचना यह कहकर की जाती है कि उन्होंने सकारात्मक स्वतंत्रता को अत्यधिक नकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया। टी. एच. ग्रीन जैसे चिंतकों का मानना है कि गरीबी और अशिक्षा भी स्वतंत्रता पर उतनी ही बड़ी बाधा हैं जितना राज्य का हस्तक्षेप।
मैकैलम की आलोचना यह है कि उनका मॉडल अत्यधिक अमूर्त (abstract) है और राजनीतिक खतरों को कम करके आँकता है। फिर भी, दोनों दृष्टिकोण आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत को समृद्ध बनाते हैं।
समकालीन प्रासंगिकता (Contemporary Relevance)
आज के समय में कल्याणकारी राज्य, शिक्षा, स्वास्थ्य और डिजिटल निगरानी जैसे मुद्दों पर बहस करते समय नकारात्मक और सकारात्मक स्वतंत्रता का द्वंद्व स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। लोकतांत्रिक राज्यों के सामने चुनौती यह है कि वे दोनों के बीच संतुलन बनाए रखें।
निष्कर्ष (Conclusion)
नकारात्मक और सकारात्मक स्वतंत्रता की बहस स्वतंत्रता की अवधारणा को गहराई से समझने का अवसर देती है। आइज़ाया बर्लिन हमें सत्ता के दुरुपयोग से सावधान करते हैं, जबकि मैकैलम स्वतंत्रता की एक व्यापक और समन्वित समझ प्रस्तुत करते हैं। MA Political Science के छात्रों के लिए यह बहस राजनीतिक सिद्धांत की आधारशिला है।
संदर्भ ग्रंथ (References)
- Berlin, Isaiah (1969). Two Concepts of Liberty
- MacCallum, Gerald C. Jr. (1967). “Negative and Positive Freedom”
- Mill, J. S. (1859). On Liberty
- Heywood, Andrew. Political Theory: An Introduction
- Stanford Encyclopedia of Philosophy – Liberty