राजनीतिक सिद्धांत में असहमति और विमर्श -Disagreements and Debates in Political Theory
परिचय (Introduction)
राजनीतिक सिद्धांत (Political Theory) कभी भी एकमत (consensus) पर आधारित विषय नहीं रहा है। इसके विकास की पूरी प्रक्रिया असहमति (disagreement), बहस (debate) और आलोचना (critique) के माध्यम से हुई है। प्लेटो द्वारा लोकतंत्र की आलोचना से लेकर समकालीन उदारवाद (Liberalism), मार्क्सवाद (Marxism), नारीवादी सिद्धांत (Feminist Theory) और उत्तर-आधुनिक विचारधाराओं (Post-modern approaches) तक, राजनीतिक सिद्धांत निरंतर वैचारिक संघर्षों से आकार लेता रहा है।

राजनीति स्वयं ऐसे मूल्यों और प्रश्नों से जुड़ी है जिन पर पूर्ण सहमति संभव नहीं है—जैसे न्याय (justice), स्वतंत्रता (liberty), समानता (equality), सत्ता (power) और अधिकार (authority)। इसी कारण राजनीतिक सिद्धांत में मतभेद स्वाभाविक और अपरिहार्य हैं। एंड्रयू हेवुड के अनुसार, राजनीतिक सिद्धांत को किसी निश्चित ज्ञान के रूप में नहीं बल्कि “निरंतर चलने वाली बौद्धिक बहस” के रूप में समझना चाहिए (Heywood, 2019)।
दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के MA Political Science के छात्रों के लिए Debates in Political Theory का उद्देश्य यही है कि छात्र इन असहमतियों को समझें, उनका विश्लेषण करें और विभिन्न दृष्टिकोणों की तुलना करना सीखें।
सैद्धांतिक पृष्ठभूमि (Conceptual Background)
राजनीतिक सिद्धांत मुख्य रूप से मानकात्मक (normative) और दार्शनिक (philosophical) प्रश्नों से संबंधित है। यह यह नहीं पूछता कि राजनीति वास्तव में कैसी है, बल्कि यह पूछता है कि राजनीति कैसी होनी चाहिए। उदाहरण के लिए—न्याय क्या है? राज्य की वैधता (legitimacy) का आधार क्या है? नागरिकों को राज्य का पालन क्यों करना चाहिए?
इन प्रश्नों का कोई एकमात्र सही उत्तर नहीं हो सकता, क्योंकि ये नैतिक मूल्यों, ऐतिहासिक परिस्थितियों और सामाजिक संरचनाओं से जुड़े होते हैं। इसी कारण राजनीतिक सिद्धांत में असहमति उत्पन्न होती है।
डब्ल्यू. बी. गैली (W. B. Gallie) ने ऐसे राजनीतिक विचारों को “मूलतः विवादित अवधारणाएँ” (Essentially Contested Concepts) कहा है (Gallie, 1956)। लोकतंत्र, स्वतंत्रता और न्याय जैसी अवधारणाएँ अलग-अलग विचारधाराओं में अलग-अलग अर्थ ग्रहण करती हैं। उदारवादी स्वतंत्रता को राज्य के हस्तक्षेप से मुक्ति मानते हैं, जबकि मार्क्सवादी इसे आर्थिक शोषण से मुक्ति के रूप में देखते हैं।
इसके अतिरिक्त, मानव स्वभाव (human nature) को लेकर विभिन्न मान्यताएँ भी असहमति को जन्म देती हैं। हॉब्स मानव को स्वार्थी मानते हैं, जबकि अरस्तू मानव को सामाजिक और नैतिक प्राणी मानते हैं। ये भिन्न मान्यताएँ राजनीतिक सिद्धांतों को अलग दिशाओं में ले जाती हैं।
प्रमुख चिंतक और उनके तर्क (Key Thinkers and Their Arguments)
शास्त्रीय राजनीतिक चिंतक (Classical Thinkers)
प्लेटो ने The Republic में आदर्श राज्य की कल्पना की, जहाँ दार्शनिक राजा (Philosopher King) शासन करते हैं। उनका मानना था कि लोकतंत्र अज्ञानियों का शासन है, जो अंततः अराजकता की ओर ले जाता है (Plato, trans. 1991)। प्लेटो का यह दृष्टिकोण राजनीतिक अभिजात्यवाद (elitism) को जन्म देता है।
इसके विपरीत, अरस्तू ने राजनीति को नैतिक गतिविधि माना। Politics में उन्होंने कहा कि मनुष्य “राजनीतिक प्राणी” (political animal) है और राज्य का उद्देश्य केवल सत्ता नहीं बल्कि सदाचार (virtue) और सामूहिक कल्याण (common good) है (Aristotle, trans. 1998)। प्लेटो और अरस्तू के बीच का मतभेद सत्ता और नागरिक भागीदारी पर प्रारंभिक बहस को दर्शाता है।
उदारवादी चिंतक (Liberal Thinkers)
जॉन लॉक ने प्राकृतिक अधिकारों (natural rights) की अवधारणा प्रस्तुत की। उनके अनुसार जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति व्यक्ति के जन्मसिद्ध अधिकार हैं, और राज्य की शक्ति जनता की सहमति (consent) से आती है (Locke, 1689)। लॉक का सिद्धांत निरंकुश शासन के विरुद्ध था।
जॉन स्टुअर्ट मिल ने On Liberty में विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन किया। उनका ‘हानि सिद्धांत’ (harm principle) कहता है कि राज्य केवल तभी हस्तक्षेप कर सकता है जब किसी की स्वतंत्रता दूसरों को हानि पहुँचाए (Mill, 1859)।
हालाँकि, उदारवाद की आलोचना यह कहकर की गई कि यह सामाजिक और आर्थिक असमानताओं की उपेक्षा करता है। इसी आलोचना से कल्याणकारी उदारवाद (welfare liberalism) विकसित हुआ।
मार्क्सवादी चिंतक (Marxist Thinkers)
कार्ल मार्क्स ने उदार राजनीतिक सिद्धांत की मूलभूत आलोचना की। उनके अनुसार राज्य वर्गीय हितों का उपकरण है और कानून तथा अधिकार शासक वर्ग के हितों की रक्षा करते हैं (Marx & Engels, 1848)। मार्क्स ने राजनीतिक स्वतंत्रता को आर्थिक समानता से जोड़ा।
एंटोनियो ग्राम्शी ने ‘हेजेमनी’ (hegemony) की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसके अनुसार शासक वर्ग केवल बल से नहीं बल्कि विचारधारा और संस्कृति के माध्यम से प्रभुत्व स्थापित करता है (Gramsci, 1971)। इससे राजनीतिक सिद्धांत में सांस्कृतिक विमर्श जुड़ा।
समकालीन चिंतक (Contemporary Thinkers)
जॉन रॉल्स ने A Theory of Justice में न्याय को निष्पक्षता (justice as fairness) के रूप में परिभाषित किया। उन्होंने ‘अज्ञान का परदा’ (veil of ignorance) और ‘मूल स्थिति’ (original position) की अवधारणाएँ दीं, ताकि न्याय के सिद्धांत निष्पक्ष रूप से चुने जा सकें (Rawls, 1971)।
रॉबर्ट नॉज़िक ने रॉल्स की आलोचना करते हुए न्यूनतम राज्य (minimal state) का समर्थन किया और पुनर्वितरण (redistribution) को व्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध माना (Nozick, 1974)। यह बहस आधुनिक उदार राजनीतिक सिद्धांत की सबसे महत्वपूर्ण बहसों में से एक है।
नारीवादी राजनीतिक सिद्धांत (Feminist Political Theory)
कैरोल पैटमैन ने The Sexual Contract में यह दिखाया कि सामाजिक अनुबंध सिद्धांतों में महिलाओं को बाहर रखा गया है (Pateman, 1988)। उन्होंने सार्वजनिक–निजी विभाजन (public–private divide) को राजनीतिक सत्ता का माध्यम बताया।
आइरिस मेरियन यंग ने न्याय को केवल संस्थागत समानता तक सीमित न मानकर संरचनात्मक अन्याय (structural injustice) और पहचान की राजनीति (politics of difference) पर जोर दिया (Young, 1990)।
राजनीतिक सिद्धांत में प्रमुख बहसें (Major Debates)
राजनीतिक सिद्धांत की सबसे केंद्रीय बहस स्वतंत्रता बनाम समानता (Liberty vs Equality) की है। उदारवादी स्वतंत्रता को प्राथमिकता देते हैं, जबकि समाजवादी समानता को आवश्यक मानते हैं। रॉल्स ने दोनों में संतुलन की कोशिश की, जबकि नॉज़िक ने इसे अस्वीकार किया।
राज्य और व्यक्ति (State vs Individual) की बहस भी महत्वपूर्ण है। हॉब्स मजबूत राज्य के पक्ष में थे, लॉक सीमित राज्य के, और मार्क्स राज्य के अंत की कल्पना करते हैं।
सार्वभौमिकता बनाम सामुदायिकता (Universalism vs Communitarianism) की बहस आधुनिक बहुसांस्कृतिक समाजों में विशेष रूप से प्रासंगिक है (Sandel, Taylor)।
आलोचना और प्रत्यालोचना (Criticism and Counter-Criticism)
उदारवाद की आलोचना उसकी व्यक्तिवादी प्रवृत्ति के लिए की जाती है, जबकि मार्क्सवाद पर आर्थिक निर्धारणवाद (economic determinism) का आरोप लगता है। नारीवादी सिद्धांत दोनों की लैंगिक अंधता की आलोचना करता है।
इन आलोचनाओं के उत्तर में नए रूप विकसित हुए—जैसे नव-उदारवाद, नव-मार्क्सवाद और विविध नारीवादी दृष्टिकोण। इस प्रकार राजनीतिक सिद्धांत आलोचना और प्रत्यालोचना के माध्यम से आगे बढ़ता है।
समकालीन प्रासंगिकता (Contemporary Relevance)
आज के समय में राजनीतिक सिद्धांत की ये बहसें निजता बनाम सुरक्षा, कल्याणकारी राज्य, पहचान की राजनीति, पर्यावरणीय न्याय और वैश्विक असमानता जैसे मुद्दों में दिखाई देती हैं। इसलिए ये बहसें केवल सैद्धांतिक नहीं बल्कि व्यावहारिक भी हैं।
DU MA परीक्षाओं के लिए महत्व
दिल्ली विश्वविद्यालय की MA परीक्षाओं में यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि:
- यह विश्लेषणात्मक उत्तर लिखने में मदद करता है
- विभिन्न चिंतकों की तुलना संभव बनाता है
- आलोचनात्मक दृष्टि विकसित करता है
निष्कर्ष (Conclusion)
राजनीतिक सिद्धांत में असहमति कोई कमजोरी नहीं बल्कि उसकी मूल शक्ति है। विभिन्न दृष्टिकोणों और बहसों के माध्यम से ही राजनीतिक विचार विकसित होते हैं। MA Political Science के छात्रों के लिए इन बहसों को समझना अकादमिक और बौद्धिक दोनों दृष्टियों से अनिवार्य है।
संदर्भ ग्रंथ (References)
- Heywood, Andrew (2019). Political Theory: An Introduction
- Parekh, Bhikhu (2010). Political Theory
- Rawls, John (1971). A Theory of Justice
- Nozick, Robert (1974). Anarchy, State, and Utopia
- Pateman, Carole (1988). The Sexual Contract
- Young, Iris Marion (1990). Justice and the Politics of Difference
- Gallie, W. B. (1956). “Essentially Contested Concepts”
FAQs
Q1. राजनीतिक सिद्धांत में असहमति क्यों होती है?
क्योंकि राजनीतिक अवधारणाएँ मूल्य-आधारित और विवादित होती हैं।
Q2. Essentially Contested Concepts का अर्थ क्या है?
ऐसी अवधारणाएँ जिन पर स्थायी सहमति संभव नहीं।
Q3. रॉल्स राजनीतिक असहमति को कैसे संबोधित करते हैं?
निष्पक्ष प्रक्रियाओं और न्याय के सिद्धांतों के माध्यम से।
Q4. नारीवादी सिद्धांत की मुख्य आलोचना क्या है?
मुख्यधारा सिद्धांतों की लैंगिक उपेक्षा।
Q5. DU MA के लिए यह विषय क्यों महत्वपूर्ण है?
क्योंकि यह आलोचनात्मक और विश्लेषणात्मक उत्तर लिखने में सहायक है।