इकाई III : सांस्कृतिक राष्ट्रवाद — पहचान, अतीत और हिंसा
(Cultural Nationalism: Conceptions of Identity, Past and Violence)
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद वह प्रभावशाली ढाँचा है जिसके माध्यम से राजनीतिक समुदाय साझा संस्कृति, इतिहास और पहचान का आह्वान कर स्वयं की कल्पना करते हैं। भारत में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ने राजनीतिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया है। यह केवल सांस्कृतिक विरासत का निष्पक्ष उत्सव नहीं रहा, बल्कि एक राजनीतिक परियोजना के रूप में कार्य करता रहा है—जो अतीत की चयनात्मक व्याख्या करता है, सदस्यता की सीमाएँ तय करता है और विशिष्ट सत्ता-संरचनाओं को वैध ठहराता है।
यह इकाई सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को ऐसे विचारों और प्रथाओं के समुच्चय के रूप में देखती है जो पहचान, ऐतिहासिक स्मृति और हिंसा को जोड़ते हैं। इसमें दिखाया गया है कि संस्कृति और परंपरा की कथाएँ किस तरह राजनीतिक एकता गढ़ती हैं और साथ ही बहिष्कार व संघर्ष को जन्म देती हैं।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और पहचान का निर्माण
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद नागरिक या संवैधानिक राष्ट्रवाद से इस मायने में भिन्न है कि वह राष्ट्र को मुख्यतः सांस्कृतिक चिह्नों—धर्म, भाषा, परंपरा और प्रतीकों—के माध्यम से परिभाषित करता है। यहाँ पहचान नागरिकता या अधिकारों से नहीं, बल्कि कथित सांस्कृतिक समानता से तय होती है।
इस ढाँचे में राष्ट्र को साझा अतीत और नैतिक मूल्यों से बँधे सांस्कृतिक समुदाय के रूप में कल्पित किया जाता है। पहचान सारतत्त्ववादी (essentialized) हो जाती है—संस्कृति को कालातीत और एकरूप दिखाया जाता है। परिणामस्वरूप आंतरिक विविधता हाशिए पर चली जाती है और बहुल तरीकों से जुड़ने की संभावनाएँ संकुचित हो जाती हैं।
भारतीय संदर्भ में अक्सर प्रभुत्वशाली सांस्कृतिक परंपराएँ ‘राष्ट्रीय’ के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं, जिससे अल्पसंख्यक संस्कृतियाँ परिधि पर धकेली जाती हैं। पहचान की राजनीति यहाँ समावेशन–बहिष्कार के माध्यम से यह तय करती है कि राष्ट्र से वैध रूप से कौन जुड़ सकता है।
अतीत एक राजनीतिक संसाधन के रूप में
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की एक निर्णायक विशेषता उसका अतीत से संबंध है। इतिहास को खुले अनुसंधान की तरह नहीं, बल्कि प्रतीकों, मिथकों और नायकों के भंडार की तरह बरता जाता है—जिसे वर्तमान राजनीतिक लक्ष्यों के लिए साधा जा सके।
अक्सर गौरवशाली और एकीकृत अतीत की रचना की जाती है, जहाँ राष्ट्र को प्राचीन, सतत सभ्यता के रूप में दिखाया जाता है। इस चयनात्मक पठन में सामाजिक संघर्ष, पदानुक्रम और ऐतिहासिक परिवर्तन ओझल हो जाते हैं। जटिल अतीत को गर्व, पीड़ितत्व या क्षति की नैतिक कथाओं में सरल कर दिया जाता है।
भारत में प्राचीन ग्रंथों, महाकाव्यों और धार्मिक परंपराओं का सहारा लेकर समकालीन दावों को वैध ठहराया जाता है। इस तरह इतिहास स्मृति-राजनीति में बदल जाता है—जहाँ याद करना और भूलना सत्ता के कृत्य बन जाते हैं।
पहचान, ‘अन्य’ का निर्माण और बहिष्कार की राजनीति
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पहचान को एक ‘अन्य’ के बरक्स गढ़ता है। राष्ट्र की आत्म-छवि सांस्कृतिक भिन्नता को खतरे या विचलन के रूप में चिह्नित करके सुसंगत बनती है।
धार्मिक अल्पसंख्यक, भाषाई समूह और असहमति की आवाज़ें अक्सर बाहरी या आंतरिक शत्रु के रूप में चित्रित की जाती हैं। यह ‘अन्यीकरण’ सांस्कृतिक भिन्नता को राजनीतिक संदेह में बदल देता है। परिणामस्वरूप राष्ट्रीय पहचान साझा संस्कृति से ही नहीं, बल्कि असंगत माने गए लोगों के बहिष्कार से भी सुरक्षित की जाती है।
ऐसी बहिष्करणात्मक तर्क-प्रणालियाँ बहुलतावाद को कमजोर करती हैं और लोकतांत्रिक सिद्धांतों को क्षति पहुँचाती हैं। राष्ट्र अधिकारों और समानता पर आधारित राजनीतिक संघ के बजाय सख्त सीमाओं वाले नैतिक समुदाय में बदल जाता है।
पवित्र राष्ट्र और हिंसा
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में हिंसा की भूमिका विरोधाभासी है। एक ओर यह स्वयं को नैतिक–आध्यात्मिक परियोजना बताता है, दूसरी ओर संस्कृति की रक्षा या ऐतिहासिक न्याय की बहाली के नाम पर हिंसा को वैध ठहरा सकता है।
जब राष्ट्र को पवित्र, प्राचीन और संकटग्रस्त माना जाता है, तो कथित शत्रुओं के विरुद्ध हिंसा आवश्यक—यहाँ तक कि पुण्य—बताई जाती है। सांस्कृतिक प्रतीक भावनात्मक रूप से आवेशित हो जाते हैं और राजनीतिक संघर्ष गहरे भावात्मक रूप धारण कर लेते हैं।
भारतीय संदर्भ में सांप्रदायिक हिंसा को अक्सर ऐतिहासिक पीड़ाओं और सांस्कृतिक संरक्षण की कथाओं से औचित्य मिलता है। यह हिंसा आकस्मिक नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक और प्रदर्शनात्मक होती है—जिसका उद्देश्य प्रभुत्व स्थापित करना और सामाजिक सीमाएँ पुनः खींचना होता है।
औपनिवेशिक अनुभव, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और आधुनिक राजनीति
भारत में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को औपनिवेशिक अनुभव से अलग नहीं किया जा सकता। औपनिवेशिक-विरोधी आंदोलनों ने संस्कृति को साम्राज्यवादी वर्चस्व के विरुद्ध गौरव और प्रतिरोध के स्रोत के रूप में अपनाया। स्वदेशी परंपराओं की पुनर्प्राप्ति आत्मसम्मान और राजनीतिक स्वायत्तता का साधन बनी।
किन्तु इस प्रक्रिया में तनाव भी उत्पन्न हुए। जहाँ संस्कृति उपनिवेशवाद के विरुद्ध एकीकृत शक्ति बनी, वहीं उसने विविध सामाजिक अनुभवों को समरूप करने का जोखिम भी उठाया। स्वतंत्रता के बाद सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ने इसी द्वंद्व को विरासत में लिया—प्रतिरोध और बहिष्कार के बीच डोलते हुए।
औपनिवेशिक-विरोधी विमर्श से एक प्रभुत्वशाली राजनीतिक विचारधारा में रूपांतरण इस बदलाव का निर्णायक क्षण है।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की आलोचनाएँ
कई विद्वानों ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की संकीर्णता और सत्तावादी प्रवृत्तियों की आलोचना की है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने आक्रामक राष्ट्रवाद के विरुद्ध चेताया, जो नैतिक सार्वभौमिकता को सांस्कृतिक गर्व के अधीन कर देता है। उन्होंने कठोर राष्ट्रीय पहचानों के स्थान पर मानवीयता, संवाद और खुलापन रेखांकित किया।
इसी तरह अमर्त्य सेन एकांगी और बहिष्करणकारी पहचान की आलोचना करते हैं। उनके अनुसार व्यक्ति की बहुस्तरीय संबद्धताएँ होती हैं जिन्हें किसी एक सांस्कृतिक सार में नहीं समेटा जा सकता। जब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद निरपेक्ष बनता है, तो वह इस बहुलता को नकार देता है और असहिष्णुता को बढ़ावा देता है।
उत्तर–औपनिवेशिक चिंतकों का तर्क है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद अक्सर जाति और लिंग जैसी आंतरिक पदानुक्रमों को ढक देता है, संस्कृति को एकीकृत रूप में पेश करके।
पहचान, स्मृति और प्रतिरोध
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद निर्विवाद नहीं है। संस्कृति, इतिहास और पहचान की वैकल्पिक व्याख्याएँ प्रभुत्वशाली कथाओं को निरंतर चुनौती देती रहती हैं। हाशिए के समूह पूछते हैं—किसकी संस्कृति ‘राष्ट्रीय’ कही जा रही है और किन इतिहासों को मिटाया जा रहा है?
साहित्य, कला और सामाजिक आंदोलनों के माध्यम से उभरती वैकल्पिक सांस्कृतिक राजनीति मौन किए गए अतीतों को सामने लाती है और पहचान को अधिक समावेशी रूप में पुनर्कल्पित करती है। ये प्रतिरोध दिखाते हैं कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद स्थिर नहीं, बल्कि लगातार मोल–भाव और संघर्ष का क्षेत्र है।
निष्कर्ष : संघर्ष का स्थल के रूप में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
भारत में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद एक शक्तिशाली लेकिन समस्याग्रस्त शक्ति के रूप में उभरता है। पहचान को अतीत की चयनात्मक दृष्टियों से जोड़कर वह राष्ट्रीय एकता रचना चाहता है, पर अक्सर विविधता और लोकतांत्रिक मूल्यों की कीमत पर। बहिष्कार पर उसकी निर्भरता और हिंसा को वैध ठहराने की क्षमता राष्ट्र-निर्माण की परियोजना में गहरे अंतर्विरोध उजागर करती है।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को संस्कृति की स्वाभाविक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति के रूप में समझना आवश्यक है। पहचान, स्मृति और हिंसा पर केंद्रित बहसें इस बात की माँग करती हैं कि राष्ट्रवाद से आलोचनात्मक संवाद किया जाए—जो बहुलता, ऐतिहासिक जटिलता और संवैधानिक नैतिकता को केंद्र में रखे।
संदर्भ (References)
- एंडरसन, बेनेडिक्ट, इमैजिंड कम्युनिटीज़
- चटर्जी, पार्थ, द नेशन एंड इट्स फ्रैगमेंट्स
- सेन, अमर्त्य, आइडेंटिटी एंड वायलेंस
- ठाकुर, रवीन्द्रनाथ, नेशनलिज़्म
- भट्ट, चेतन, हिंदू राष्ट्रवाद: उत्पत्ति, विचारधाराएँ और आधुनिक मिथक