अलगाववाद (Secessionism) और अलगाववादी राजनीति
राज्य स्वायत्तता और अलगाववाद का प्रश्न आधुनिक संघीय राज्यों की सबसे जटिल राजनीतिक चुनौतियों में से एक रहा है। जम्मू और कश्मीर के संदर्भ में यह प्रश्न और भी गहरा हो जाता है, क्योंकि यहाँ इतिहास, संवैधानिक व्यवस्था, पहचान की राजनीति और लोकतांत्रिक अनुभव आपस में गुँथे हुए हैं।
जम्मू और कश्मीर में अलगाववादी राजनीति को केवल भारत से पृथक होने की माँग के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह राजनीति वास्तव में स्वायत्तता, आत्म-शासन, गरिमा और राजनीतिक मान्यता से जुड़े विभिन्न दावों का एक विस्तृत स्पेक्ट्रम रही है।
यह अध्याय राज्य स्वायत्तता, संघवाद और अलगाववाद के आपसी संबंधों को समझने का प्रयास करता है और यह दिखाता है कि अलगाववादी राजनीति अक्सर संघीय व्यवस्था के भीतर उत्पन्न तनावों की अभिव्यक्ति होती है।
अवधारणात्मक ढाँचा: स्वायत्तता, संघवाद और अलगाववाद
राज्य स्वायत्तता का अर्थ है कि किसी संघीय राज्य की इकाई को अपने आंतरिक मामलों में निर्णय लेने की वास्तविक शक्ति प्राप्त हो। इसमें—
- विधायी अधिकार
- प्रशासनिक नियंत्रण
- कभी-कभी विशिष्ट संवैधानिक अधिकार
शामिल होते हैं।
संघवाद का उद्देश्य सत्ता को केंद्र और राज्यों के बीच इस प्रकार बाँटना है कि—
- राष्ट्रीय एकता बनी रहे
- क्षेत्रीय विविधताओं को सम्मान मिले
इसके विपरीत, अलगाववाद (Secessionism) वह राजनीतिक प्रवृत्ति है, जिसमें कोई क्षेत्र स्वयं को मौजूदा राजनीतिक संघ से अलग करना चाहता है।
अलगाववादी राजनीति प्रायः तब उभरती है जब—
- स्वायत्तता की व्यवस्थाएँ खोखली प्रतीत हों
- लोकतांत्रिक भागीदारी बाधित हो
- पहचान और गरिमा से जुड़े प्रश्न अनसुलझे रहें
इस अर्थ में अलगाववाद अक्सर संघीय संकट और राजनीतिक अलगाव का लक्षण होता है।
जम्मू और कश्मीर में अलगाववादी राजनीति की ऐतिहासिक जड़ें
जम्मू और कश्मीर में अलगाववादी राजनीति की जड़ें निम्न कारकों में निहित हैं—
- विवादित विलय की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- स्वायत्तता और आत्म-शासन के वादे
- लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में बार-बार व्यवधान
राज्य को प्रारंभ में जो विशेष संवैधानिक दर्जा मिला, उसका उद्देश्य इन विशिष्ट परिस्थितियों को समायोजित करना था। किंतु समय के साथ स्वायत्तता का क्रमिक क्षरण हुआ, जिसने संघीय आश्वासनों की विश्वसनीयता को कमज़ोर कर दिया।
जैसे-जैसे स्वायत्तता कमजोर होती गई, राजनीतिक माँगें भी अधिक उग्र और कट्टर रूप लेती चली गईं।
स्वायत्तता: अलगाववाद के विरुद्ध एक मध्यस्थ सिद्धांत
संघीय सिद्धांत के अनुसार स्वायत्तता का कार्य—
- अलगाववादी प्रवृत्तियों को रोकना
- क्षेत्रीय असंतोष को संवैधानिक ढाँचे में समाहित करना
होता है।
जम्मू और कश्मीर में स्वायत्तता से यह अपेक्षा थी कि—
- क्षेत्रीय पहचान सुरक्षित रहे
- स्थानीय राजनीति सशक्त हो
- केंद्र और राज्य के बीच विश्वास बने
परंतु जब स्वायत्तता वास्तविक शक्ति के बजाय केवल औपचारिक प्रावधान बनकर रह गई, तो वह अलगाववादी राजनीति को रोकने में विफल रही।
अलगाववादी विचारधाराएँ और राजनीतिक mobilization
जम्मू और कश्मीर की अलगाववादी राजनीति एकरूप नहीं रही। इसमें—
- पूर्ण स्वतंत्रता की माँग
- आत्मनिर्णय या जनमत-संग्रह की वकालत
- संप्रभुता की पुनर्परिभाषा
जैसे विविध विचार शामिल रहे।
इन विचारों का राजनीतिक mobilization प्रायः—
- ऐतिहासिक स्मृतियों
- पहचान-आधारित आख्यानों
- राजनीतिक बहिष्करण के अनुभवों
पर आधारित रहा।
अलगाववादी राजनीति ने स्वयं को केवल क्षेत्रीय अलगाव नहीं, बल्कि सम्मान और आत्म-निर्णय के संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया।
केंद्रीकरण और संघीय असंतुलन
अलगाववादी राजनीति को बढ़ावा देने वाला एक प्रमुख कारण रहा है अत्यधिक केंद्रीकरण।
केंद्र सरकार द्वारा बार-बार—
- निर्वाचित सरकारों का हस्तक्षेप
- क्षेत्रीय संस्थाओं का कमजोर होना
- संघीय संवाद की कमी
ने यह धारणा पैदा की कि संघवाद साझेदारी की बजाय नियंत्रण का माध्यम बन गया है।
इस संदर्भ में अलगाववादी राजनीति को भावनात्मक और प्रतीकात्मक समर्थन मिलने लगा।
लोकतंत्र, प्रतिनिधित्व और अलगाववाद
लोकतंत्र और अलगाववाद का संबंध अत्यंत महत्वपूर्ण है। जहाँ—
- स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव
- विश्वसनीय प्रतिनिधित्व
- सतत राजनीतिक भागीदारी
होती है, वहाँ अलगाववादी राजनीति सीमित रहती है।
जम्मू और कश्मीर में चुनावी प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता पर संदेह और राजनीतिक स्थान के संकुचन ने प्रतिनिधित्व का संकट उत्पन्न किया। परिणामस्वरूप अलगाववादी राजनीति असहमति की अभिव्यक्ति का वैकल्पिक मंच बन गई।
हिंसा, सैन्यीकरण और कट्टरता
जब अलगाववादी राजनीति ने हिंसक रूप धारण किया, तब राजनीतिक संवाद की संभावनाएँ और सीमित हो गईं।
सैन्यीकरण ने—
- संवाद के स्थान को संकुचित किया
- “या तो–या” की राजनीति को बढ़ावा दिया
- कठोर सुरक्षा प्रतिक्रियाओं को जन्म दिया
इस प्रक्रिया में अलगाववादी राजनीति अधिक कट्टर और अपरिवर्तनीय होती चली गई।
तुलनात्मक संघीय दृष्टिकोण
अन्य संघीय राज्यों के अनुभव दर्शाते हैं कि—
- लचीला संघवाद
- वास्तविक स्वायत्तता
- लोकतांत्रिक समावेशन
अलगाववादी प्रवृत्तियों को नियंत्रित करने में सहायक होते हैं।
इसके विपरीत, कठोर केंद्रीकरण और बल-आधारित नीतियाँ अलगाववाद को और गहरा करती हैं।
जम्मू और कश्मीर इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
स्वायत्तता बनाम अलगाव: एक कृत्रिम द्वंद्व
जम्मू और कश्मीर की राजनीति को केवल स्वायत्तता बनाम अलगाव के द्वंद्व में बाँधना वास्तविकता को सरल बना देता है।
ऐतिहासिक रूप से अनेक राजनीतिक शक्तियाँ पूर्ण अलगाव के बजाय संघीय ढाँचे के भीतर अधिकतम स्वायत्तता की माँग करती रही हैं।
स्वायत्तता के क्षरण ने इस मध्य मार्ग को संकीर्ण कर दिया और राजनीति को ध्रुवीकृत कर दिया।
समकालीन प्रासंगिकता
भले ही कुछ समय में अलगाववादी mobilization कमजोर हुई हो, परंतु उससे जुड़े प्रश्न—
- विश्वास
- प्रतिनिधित्व
- गरिमा
आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं।
अलगाववादी राजनीति अब भी राज्य–समाज संबंधों और संघीय बहसों को प्रभावित करती है।
निष्कर्ष
जम्मू और कश्मीर में अलगाववाद और अलगाववादी राजनीति को संघीय विफलताओं, स्वायत्तता के क्षरण और लोकतांत्रिक व्यवधानों के परिणाम के रूप में समझना चाहिए। यह राजनीति संघवाद के विरोध में नहीं, बल्कि उसके अधूरे क्रियान्वयन की प्रतिक्रिया के रूप में उभरी।
यह अनुभव स्पष्ट करता है कि राज्य स्वायत्तता कोई रियायत नहीं, बल्कि बहुलतावादी संघीय व्यवस्था को स्थिर रखने का आधार है।
जहाँ स्वायत्तता वास्तविक और लोकतांत्रिक होती है, वहाँ अलगाववादी राजनीति कमजोर पड़ती है; और जहाँ वह खोखली हो जाती है, वहाँ अलगाववाद को बल मिलता है।
अतः अलगाववादी राजनीति का समाधान केवल सुरक्षा या दमन में नहीं, बल्कि—
- संवैधानिक विश्वास की पुनर्स्थापना
- सार्थक राजनीतिक संवाद
- संघीय बहुलता के सम्मान
में निहित है।
संदर्भ (References)
- Constitution of India
- Noorani, A.G. Article 370: A Constitutional History of Jammu and Kashmir
- Bose, Sumantra. Kashmir: Roots of Conflict, Paths to Peace
- Austin, Granville. The Indian Constitution: Cornerstone of a Nation
- Stepan, Alfred. Federalism and Democracy