मानव अधिकार – मुद्दे, चुनौतियाँ और समकालीन सरोकार: लैंगिकता (Gender)
(भारतीय संदर्भ)
लैंगिकता भारत में मानव अधिकारों से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण और व्यापक मुद्दों में से एक है। लैंगिक असमानता केवल क़ानूनी भेदभाव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक मानदंडों, सांस्कृतिक प्रथाओं, आर्थिक संरचनाओं और सत्ता-संबंधों में गहराई से निहित है। इसी कारण लैंगिक प्रश्न मानव अधिकारों को केवल संवैधानिक घोषणाओं से आगे बढ़ाकर गरिमा, स्वायत्तता और समानता के लिए रोज़मर्रा के संघर्ष में परिवर्तित कर देता है।
भारतीय संदर्भ में लैंगिक मानव अधिकारों का प्रश्न संवैधानिक समानता और सामाजिक यथार्थ के बीच के गहरे अंतर को उजागर करता है। मज़बूत क़ानूनी प्रावधानों के बावजूद महिलाएँ और लैंगिक अल्पसंख्यक आज भी व्यवस्थित भेदभाव और वंचना का सामना करते हैं।
लैंगिकता एक मानव अधिकार समस्या के रूप में
मानव अधिकारों की दृष्टि से लैंगिक असमानता निम्न मूल अधिकारों का उल्लंघन है—
- समानता और भेदभाव से मुक्ति
- जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार
- मानवीय गरिमा और शारीरिक स्वायत्तता
- हिंसा और शोषण से सुरक्षा
लैंगिक भेदभाव सार्वजनिक और निजी—दोनों क्षेत्रों में विद्यमान है: परिवार, समुदाय, कार्यस्थल और राज्य संस्थाएँ। यही कारण है कि लैंगिक उत्पीड़न संरचनात्मक, सामान्यीकृत और अदृश्य रूप ले लेता है।
संवैधानिक ढाँचा और लैंगिक समानता
भारत में लैंगिक समानता की संवैधानिक प्रतिबद्धता स्पष्ट है। Constitution of India सुनिश्चित करता है—
- क़ानून के समक्ष समानता
- लिंग के आधार पर भेदभाव का निषेध
- सार्वजनिक रोज़गार में समान अवसर
साथ ही, संविधान महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान की अनुमति देता है, जो यह स्वीकार करता है कि औपचारिक समानता सामाजिक असमानताओं को दूर करने के लिए पर्याप्त नहीं है। यह दृष्टिकोण वास्तविक (substantive) समानता पर आधारित है।
शरीर, गरिमा और लैंगिक अधिकार
लैंगिक मानव अधिकारों का सबसे गहरा आयाम शरीर पर अधिकार से जुड़ा है। घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न, बलात्कार, बाल विवाह और प्रजनन पर नियंत्रण जैसी प्रथाएँ शारीरिक स्वायत्तता और गरिमा का गंभीर उल्लंघन हैं।
लैंगिक हिंसा केवल आपराधिक समस्या नहीं, बल्कि एक मानव अधिकार उल्लंघन है, जो असमान सत्ता-संबंधों को दर्शाता है। यह हिंसा क़ानून के बावजूद बनी रहती है, क्योंकि सामाजिक मानदंड अक्सर नियंत्रण और अधीनता को वैध ठहराते हैं।
आर्थिक अधिकार और लैंगिक असमानता
आर्थिक क्षेत्र में लैंगिक असमानता समकालीन भारत की एक गंभीर मानव अधिकार चुनौती है। महिलाएँ अक्सर—
- असंगठित और अवैतनिक श्रम में संलग्न रहती हैं
- कम मज़दूरी और असुरक्षित रोज़गार में कार्यरत होती हैं
- देखभाल और घरेलू कार्य का भार उठाती हैं, जिसे आर्थिक मूल्य नहीं मिलता
आर्थिक निर्भरता महिलाओं की अन्य अधिकारों तक पहुँच को भी सीमित करती है। मानव अधिकार विमर्श यह मानता है कि आर्थिक निर्भरता स्वयं एक प्रकार की संरचनात्मक हिंसा है।
क़ानून, न्याय और लैंगिक अधिकार
भारत में लैंगिक संरक्षण के लिए अनेक क़ानून मौजूद हैं, फिर भी न्याय तक पहुँच एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। प्रमुख बाधाएँ हैं—
- सामाजिक कलंक और प्रतिशोध का भय
- पुलिस और प्रशासन की असंवेदनशीलता
- न्यायिक प्रक्रिया में विलंब
भारतीय न्यायपालिका, विशेष रूप से Supreme Court of India, ने गरिमा, निजता और समानता को लैंगिक न्याय से जोड़ते हुए अधिकारों की व्याख्या का विस्तार किया है। फिर भी, न्यायिक प्रगति और ज़मीनी हकीकत के बीच अंतर बना हुआ है।
महिलाओं से आगे: लैंगिक अल्पसंख्यक और मानव अधिकार
समकालीन मानव अधिकार विमर्श यह स्वीकार करता है कि लैंगिकता केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है। लैंगिक अल्पसंख्यक शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य और सामाजिक स्वीकृति के क्षेत्र में भेदभाव का सामना करते हैं।
उनकी माँगें पहचान, सम्मान और स्वायत्तता से जुड़ी हैं, जो मानव अधिकारों की परिधि को और व्यापक बनाती हैं।
संस्कृति, परंपरा और लैंगिक न्याय
लैंगिक मानव अधिकारों की प्राप्ति में एक बड़ी चुनौती संस्कृति और समानता के बीच का तनाव है। कई बार भेदभावपूर्ण प्रथाओं को परंपरा, नैतिकता या सामुदायिक स्वायत्तता के नाम पर उचित ठहराया जाता है।
मानव अधिकार दृष्टिकोण यह स्पष्ट करता है कि संस्कृति मानव गरिमा के उल्लंघन का आधार नहीं हो सकती। साथ ही, सामाजिक परिवर्तन के लिए सांस्कृतिक संदर्भों से संवाद भी आवश्यक है।
समकालीन चुनौतियाँ और नए सरोकार
आज लैंगिक मानव अधिकार नए संदर्भों में उभर रहे हैं—
- डिजिटल माध्यमों में उत्पीड़न और निगरानी
- लैंगिक समानता के विरुद्ध सामाजिक–राजनीतिक प्रतिक्रिया
- आर्थिक संकटों का महिलाओं पर असमान प्रभाव
- नारीवादी और लैंगिक अधिकार आंदोलनों के प्रति विरोध
ये प्रवृत्तियाँ दर्शाती हैं कि लैंगिक अन्याय बदलते रूपों में बना रहता है।
लोकतंत्र, सहभागिता और लैंगिक अधिकार
लैंगिक समानता लोकतंत्र की गुणवत्ता का महत्वपूर्ण सूचक है। जब समाज का आधा हिस्सा निर्णय-निर्माण से वंचित रहता है, तो लोकतंत्र अधूरा हो जाता है।
मानव अधिकार केवल सुरक्षा नहीं, बल्कि समान राजनीतिक सहभागिता, प्रतिनिधित्व और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी की भी माँग करते हैं।
निष्कर्ष
लैंगिकता भारत में मानव अधिकारों की सबसे जटिल और स्थायी चुनौती है। संवैधानिक प्रतिबद्धताओं और क़ानूनी सुधारों के बावजूद, गहरे सामाजिक मानदंड और आर्थिक असमानताएँ लैंगिक समानता को बाधित करती रहती हैं।
भारतीय अनुभव यह दर्शाता है कि लैंगिक मानव अधिकारों की प्राप्ति केवल क़ानून से संभव नहीं है। इसके लिए सतत सामाजिक परिवर्तन, संस्थागत जवाबदेही, सांस्कृतिक पुनर्विचार और राजनीतिक इच्छाशक्ति आवश्यक है। लैंगिक न्याय मानव गरिमा, समानता और लोकतांत्रिक न्याय की प्राप्ति का अनिवार्य आधार है।
संदर्भ (References)
- Sen, Amartya. Development as Freedom
- Baxi, Upendra. The Future of Human Rights
- Agnes, Flavia. Law and Gender Inequality
- Nussbaum, Martha. Women and Human Development
- Constitution of India