इकाई II : आधुनिक आत्म (The Modern Self)
Culture and Politics in India पाठ्यक्रम में आधुनिक आत्म (modern self) की अवधारणा संस्कृति और राजनीति के आपसी संबंध को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। आत्म कोई स्वाभाविक या कालातीत इकाई नहीं है; बल्कि वह ऐतिहासिक रूप से निर्मित, सांस्कृतिक रूप से आकारित और राजनीतिक रूप से विनियमित होती है। इस इकाई में आधुनिक आत्म को सामाजिक परिवर्तन, औपनिवेशिक अनुभव, दार्शनिक परंपराओं और सत्ता के बदलते रूपों के परिणाम के रूप में समझा जाता है। आधुनिक आत्म का उदय पारंपरिक, समुदाय-आधारित पहचानों से हटकर अधिक आत्मचिंतनशील, वैयक्तिक और अधिकार-आधारित व्यक्तित्व की ओर संकेत करता है।
हालाँकि भारतीय संदर्भ में यह परिवर्तन सरल या रैखिक नहीं रहा है। यहाँ आधुनिक आत्म ने पारंपरिक पहचानों का स्थान पूरी तरह नहीं लिया, बल्कि वह जाति, धर्म, समुदाय और सामूहिक संबद्धता के साथ तनाव और अंतर्विरोध में विकसित हुई है।
पारंपरिक आत्म से आधुनिक आत्म तक
पूर्व-आधुनिक समाजों में आत्म की पहचान मुख्यतः सामूहिक संरचनाओं—परिवार, जाति, धर्म और समुदाय—के माध्यम से तय होती थी। व्यक्ति की पहचान व्यक्तिगत चयन या आत्मनिर्णय से अधिक सामाजिक भूमिकाओं और नैतिक कर्तव्यों से जुड़ी होती थी। स्वतंत्र, अधिकार-संपन्न और नैतिक एजेंट के रूप में आत्म की धारणा सीमित थी।
इसके विपरीत, आधुनिक आत्म व्यक्तित्व, आत्मचिंतन और चेतन स्व-परिचय पर आधारित है। इसमें यह मान्यता निहित है कि व्यक्ति के पास तर्क, चयन और नैतिक निर्णय की क्षमता होती है। यह बदलाव आधुनिक राज्य, कानून, शिक्षा और बाज़ार जैसी संस्थाओं के विकास से गहराई से जुड़ा है।
फिर भी, इस रूपांतरण को सार्वभौमिक या पूर्ण मानना भ्रामक होगा। परंपरागत और आधुनिक आत्म की सह-अस्तित्व वाली स्थितियाँ विशेषकर उत्तर–औपनिवेशिक समाजों में मिश्रित और विवादित पहचानों को जन्म देती हैं।
आधुनिक आत्म के दार्शनिक आधार
आधुनिक आत्म की अवधारणा के निर्माण में पाश्चात्य दर्शन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। रेने देकार्त ने तर्कसंगत चेतना को आत्म की आधारशिला माना और विचार को आत्म-परिचय का मूल स्रोत बताया। प्रबोधनकालीन दर्शन ने आत्म को एक तर्कसंगत और स्वायत्त नैतिक व्यक्ति के रूप में विकसित किया।
बाद के दार्शनिकों ने इस दृष्टिकोण को और जटिल बनाया। इमैनुएल कांट ने आत्म को नैतिक नियमों द्वारा शासित एक नैतिक विषय के रूप में समझा, जबकि आधुनिक सामाजिक सिद्धांतों ने यह दिखाया कि आत्म समाज से बाहर नहीं, बल्कि समाज के भीतर निर्मित होती है।
इन दार्शनिक परंपराओं ने अधिकार, नागरिकता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे आधुनिक राजनीतिक विचारों को गहराई से प्रभावित किया।
औपनिवेशिक अनुभव और आधुनिक भारतीय आत्म
भारत में आधुनिक आत्म का निर्माण औपनिवेशिक शासन से गहराई से जुड़ा रहा है। औपनिवेशिक राज्य ने शिक्षा, कानून, नौकरशाही और प्रिंट संस्कृति के माध्यम से व्यक्तित्व, अनुशासन और तर्कशीलता की नई धारणाएँ प्रस्तुत कीं। इन संस्थाओं ने व्यक्ति को एक आधुनिक, अनुशासित विषय के रूप में गढ़ने का प्रयास किया।
साथ ही, औपनिवेशिक ज्ञान-प्रणालियों ने भारतीय समाज को जाति, धर्म, जनजाति और नस्ल जैसी श्रेणियों में वर्गीकृत किया। परिणामस्वरूप, आधुनिक भारतीय आत्म एक विरोधाभासी प्रक्रिया से गुज़री—एक ओर उसे तर्कसंगत और आत्मनिर्भर विषय बनने के लिए प्रेरित किया गया, दूसरी ओर उसे कठोर सामाजिक पहचानों में बाँध दिया गया।
उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के सुधार आंदोलनों ने शिक्षा, नैतिक सुधार और सामाजिक आलोचना के माध्यम से आत्म के पुनर्निर्माण का प्रयास किया, जहाँ परंपरा और आधुनिकता के बीच निरंतर मोल-भाव चलता रहा।
आत्म, सत्ता और अनुशासन
आधुनिक सामाजिक सिद्धांत इस बात पर बल देते हैं कि आधुनिकता केवल आत्म को मुक्त ही नहीं करती, बल्कि उसे अनुशासित और नियंत्रित भी करती है। विद्यालय, कारागार, कार्यस्थल और अस्पताल जैसी संस्थाएँ व्यक्तियों के आचरण, इच्छाओं और पहचान को आकार देती हैं।
आधुनिक आत्म अनुशासन, उत्पादकता और सम्माननीयता जैसे मानदंडों को आंतरिक रूप से स्वीकार कर लेती है। सत्ता केवल बल प्रयोग से नहीं, बल्कि इस बात से भी कार्य करती है कि व्यक्ति खुद को कैसे समझता है। यह दृष्टि इस धारणा को चुनौती देती है कि आधुनिकता स्वतः स्वतंत्रता लेकर आती है।
भारतीय संदर्भ में ये अनुशासनात्मक प्रक्रियाएँ जाति, लिंग और वर्ग के साथ जुड़कर असमान आधुनिक आत्मों का निर्माण करती हैं।
जाति, लिंग और आधुनिक आत्म की सीमाएँ
भारत में आधुनिक आत्म का विकास जाति और पितृसत्तात्मक संरचनाओं द्वारा गहराई से सीमित रहा है। यद्यपि आधुनिक विमर्श समानता और अधिकारों की बात करता है, सामाजिक यथार्थ अक्सर इन मूल्यों को साकार नहीं होने देता।
दलितों और निम्न जातियों के लिए पारंपरिक पहचानें अपमान और बहिष्कार से जुड़ी रहीं, जिससे शिक्षा, सार्वजनिक स्थान और आत्मसम्मान तक पहुँच बाधित हुई। इसी प्रकार, स्त्रियों की आत्म-रचना पितृसत्तात्मक मानदंडों द्वारा नियंत्रित रही, जो स्वायत्तता और शारीरिक स्वतंत्रता को सीमित करते हैं।
इस प्रकार, आधुनिक आत्म के वादे और सामाजिक असमानताओं की वास्तविकता के बीच एक मूलभूत अंतर्विरोध बना रहता है।
राष्ट्रवाद और सामूहिक आत्म
राष्ट्रवाद ने आधुनिक आत्म को एक नया आयाम दिया, जिसमें व्यक्ति की पहचान राष्ट्र से जुड़ गई। आत्म को केवल निजी व्यक्ति नहीं, बल्कि राष्ट्र से संबद्ध नागरिक के रूप में कल्पित किया गया।
औपनिवेशिक-विरोधी राष्ट्रवाद में आधुनिक आत्म को नैतिक रूप से अनुशासित, सांस्कृतिक रूप से प्रामाणिक और राजनीतिक रूप से प्रतिबद्ध माना गया। त्याग, कर्तव्य और राष्ट्र-सेवा जैसे आदर्श कई बार व्यक्तिगत स्वायत्तता से टकराते रहे।
इस प्रकार राष्ट्रवाद ने आधुनिक आत्म को सामूहिक नैतिक अपेक्षाओं से जोड़ दिया, जिससे व्यक्ति और समुदाय के बीच तनाव उत्पन्न हुआ।
उत्तर–औपनिवेशिक दृष्टिकोण और आधुनिक आत्म
उत्तर–औपनिवेशिक चिंतकों के अनुसार गैर–पश्चिमी समाजों में आधुनिक आत्म को पश्चिमी व्यक्तिवाद की सीधी नकल के रूप में नहीं समझा जा सकता। दिपेश चक्रवर्ती के अनुसार भारतीय आधुनिकता में बहुवचन समयबोध (plural temporalities) मौजूद हैं, जहाँ परंपरा और आधुनिकता सह-अस्तित्व में रहती हैं।
इसी तरह, अमर्त्य सेन तर्क, संवाद और नैतिक एजेंसी को आत्म-निर्माण का केंद्रीय तत्व मानते हैं और सांस्कृतिक नियतिवाद को अस्वीकार करते हैं।
ये दृष्टिकोण स्पष्ट करते हैं कि भारतीय आधुनिक आत्म एकरूप नहीं, बल्कि खंडित, संदर्भ-आधारित और सतत् रूप से निर्मित होने वाली प्रक्रिया है।
निष्कर्ष : एक विवादित और अपूर्ण निर्माण
इस इकाई में आधुनिक आत्म एक विवादित, असमान और अधूरी परियोजना के रूप में उभरती है। वह तर्कशीलता, स्वायत्तता और अधिकारों का वादा करती है, लेकिन सामाजिक पदानुक्रमों और सामूहिक पहचानों द्वारा सीमित रहती है।
आधुनिक आत्म को किसी पूर्ण उपलब्धि के रूप में नहीं, बल्कि समानता, मान्यता और स्वतंत्रता के लिए चल रहे संघर्षों से निर्मित एक सतत प्रक्रिया के रूप में समझना अधिक उपयुक्त है। यही समझ आगे की इकाइयों—राष्ट्रवाद, प्रतिरोध और सांस्कृतिक राजनीति—के विश्लेषण के लिए वैचारिक आधार प्रदान करती है।
संदर्भ (References)
- देकार्त, रेने, मेडिटेशन्स ऑन फर्स्ट फिलॉसफी
- कांट, इमैनुएल, ग्राउंडवर्क ऑफ़ द मेटाफ़िज़िक्स ऑफ़ मॉरल्स
- मोहन्टी, जे. एन., द सेल्फ एंड इट्स अदर
- चक्रवर्ती, दिपेश, यूरोप का प्रांतीयकरण
- सेन, अमर्त्य, द आर्ग्युमेंटेटिव इंडिया
- टेलर, चार्ल्स, सोर्सेज़ ऑफ़ द सेल्फ