इकाई I : समाज की अवधारणा
(Unit I: Conception of Society)
Culture and Politics in India पाठ्यक्रम में समाज की अवधारणा एक मूलभूत सैद्धांतिक आधार प्रदान करती है। यहाँ समाज को केवल व्यक्तियों या संस्थाओं के समूह के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक रूप से निर्मित, सांस्कृतिक रूप से मध्यस्थित और राजनीतिक रूप से संरचित प्रक्रिया के रूप में समझा जाता है। इस दृष्टिकोण के अनुसार समाज का निर्माण केवल भौतिक संरचनाओं से नहीं, बल्कि अर्थों, प्रतीकों, सत्ता संबंधों और सामूहिक कल्पनाओं से होता है।
यह समझ पारंपरिक संरचनात्मक या संस्थागत विश्लेषण से आगे बढ़कर समाज को एक सांस्कृतिक–राजनीतिक प्रक्रिया के रूप में देखती है, जो निरंतर निर्मित, पुनर्निर्मित और विवादित होती रहती है।
संरचना से आगे समाज : सांस्कृतिक दृष्टिकोण
परंपरागत राजनीतिक और समाजशास्त्रीय चिंतन में समाज को प्रायः आर्थिक, कानूनी या संस्थागत संरचनाओं की एक व्यवस्था के रूप में देखा गया। यद्यपि ये दृष्टिकोण महत्वपूर्ण हैं, समकालीन अध्ययन इस बात पर ज़ोर देते हैं कि समाज संस्कृति, भाषा, स्मृति और दैनिक व्यवहारों के माध्यम से भी गठित होता है।
इस दृष्टि से समाज कोई स्थिर या बाह्य वस्तु नहीं है, बल्कि वह यह भी है कि लोग अपने सामूहिक जीवन को कैसे समझते, कल्पना करते और अनुभव करते हैं। सांस्कृतिक मानदंड, नैतिक मूल्य, धार्मिक विश्वास और प्रतीकात्मक व्यवहार सामाजिक संबंधों को आकार देते हैं। राजनीति समाज के बाहर से उस पर प्रभाव नहीं डालती, बल्कि इन्हीं सांस्कृतिक प्रक्रियाओं के भीतर कार्य करती है।
यह दृष्टिकोण सामाजिक व्यवस्था को केवल तर्कसंगत या कार्यात्मक मानने की धारणा को चुनौती देता है और भावनाओं, पहचानों, परंपराओं तथा कथाओं की भूमिका को सामने लाता है।
समाज की शास्त्रीय अवधारणाएँ : पृष्ठभूमि
समकालीन बहसों को समझने के लिए समाज की शास्त्रीय अवधारणाओं को संक्षेप में देखना आवश्यक है। कार्ल मार्क्स, मैक्स वेबर और एमिल दुर्खीम ने समाज को समझने के प्रभावशाली लेकिन भिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत किए।
मार्क्स ने समाज को मुख्यतः भौतिक संबंधों और वर्ग संघर्ष के संदर्भ में देखा और आर्थिक संरचना को सामाजिक जीवन का निर्धारक माना। वेबर ने सामाजिक क्रिया को समझने में विचारों, मूल्यों और अर्थों की भूमिका पर बल दिया, विशेषकर धर्म और संस्कृति के संदर्भ में। दुर्खीम ने समाज को एक नैतिक और सामूहिक सत्ता के रूप में देखा, जो साझा मानदंडों और सामाजिक एकजुटता पर आधारित होती है।
इन दृष्टिकोणों में भिन्नता होते हुए भी एक साझा अंतर्दृष्टि है—समाज कोई प्राकृतिक या स्थायी इकाई नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से निर्मित और ऐतिहासिक रूप से स्थित वास्तविकता है।
समाज : एक ऐतिहासिक और विमर्शात्मक निर्माण
उत्तर–औपनिवेशिक और सांस्कृतिक सिद्धांतों का एक महत्वपूर्ण योगदान यह है कि समाज को ऐतिहासिक और विमर्शात्मक निर्माण के रूप में समझा जाए। परंपरा, समुदाय, राष्ट्र या आधुनिकता जैसी श्रेणियाँ स्थिर नहीं होतीं, बल्कि ऐतिहासिक संघर्षों, बौद्धिक बहसों और राजनीतिक परियोजनाओं के माध्यम से निर्मित होती हैं।
भारतीय संदर्भ में औपनिवेशिक शासन ने समाज की अवधारणा को गहराई से प्रभावित किया। जाति, धर्म, जनजाति और समुदाय जैसी श्रेणियों के माध्यम से भारतीय समाज को वर्गीकृत किया गया, जिससे लचीली सामाजिक प्रथाएँ कठोर पहचानों में बदल गईं। ये वर्गीकरण केवल समाज का वर्णन नहीं थे, बल्कि उन्होंने सामाजिक यथार्थ को पुनर्गठित किया।
उत्तर–औपनिवेशिक चिंतन इस बात पर बल देता है कि भारतीय समाज को समझने के लिए इन ज्ञान–श्रेणियों और सत्ता–संबंधों की आलोचनात्मक जाँच आवश्यक है।
समाज, संस्कृति और सत्ता
इस पाठ्यक्रम में समाज की अवधारणा का एक केंद्रीय पक्ष है संस्कृति और सत्ता का संबंध। संस्कृति कोई तटस्थ क्षेत्र नहीं है, बल्कि वह वर्चस्व और प्रतिरोध का क्षेत्र है। अनुष्ठान, त्योहार, भाषा, साहित्य, कला और रोज़मर्रा की प्रथाएँ सत्ता संबंधों को प्रतिबिंबित भी करती हैं और चुनौती भी देती हैं।
इस दृष्टि से समाज को एक संघर्ष का क्षेत्र माना जाता है, जहाँ पहचान, नैतिकता और सामाजिक संबंधों को लेकर विभिन्न दृष्टिकोण आमने–सामने होते हैं। समाज कोई सामंजस्यपूर्ण इकाई नहीं, बल्कि निरंतर मोल–भाव और संघर्ष से निर्मित वास्तविकता है।
समाज और आत्म (Self) का प्रश्न
समाज की अवधारणा को आत्म की अवधारणा से अलग नहीं किया जा सकता। व्यक्ति समाज से पहले अस्तित्व में नहीं आता; उसकी पहचान सामाजिक मानदंडों, सांस्कृतिक अपेक्षाओं और राजनीतिक संस्थाओं द्वारा निर्मित होती है। समाज विशेष प्रकार के आत्म का निर्माण करता है—जाति-आधारित, लिंग-आधारित, धार्मिक, राष्ट्रीय या आधुनिक।
आधुनिक सामाजिक सिद्धांत मानते हैं कि आत्म न तो पूरी तरह स्वतंत्र है और न ही पूरी तरह नियत। वह सामाजिक अंतःक्रिया और सांस्कृतिक मध्यस्थता के माध्यम से निर्मित होता है। यह समझ आगे चलकर आधुनिकता, राष्ट्रवाद और पहचान से जुड़ी बहसों के लिए आधार प्रदान करती है।
भारतीय समाज : विविधता, पदानुक्रम और बहुलता
भारतीय समाज की किसी भी अवधारणा को उसकी असाधारण विविधता और गहरी पदानुक्रमों से जूझना पड़ता है। जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और लिंग सामाजिक संबंधों को जटिल ढंग से संरचित करते हैं। समकालीन दृष्टिकोण विविधता को केवल सांस्कृतिक बहुलता नहीं, बल्कि असमान शक्ति संबंधों के माध्यम से संगठित वास्तविकता के रूप में देखते हैं।
भारतीय समाज को किसी एकीकृत सिद्धांत से नहीं समझा जा सकता। यह एक ओर एकता और दूसरी ओर भिन्नता, परंपरा और परिवर्तन, वर्चस्व और प्रतिरोध—इन सभी के तनावों से निर्मित है। संस्कृति इन तनावों की मध्यस्थता करती है और इसी कारण राजनीति का एक प्रमुख क्षेत्र बन जाती है।
समाज के सार्वभौमिक मॉडलों की आलोचना
समकालीन चिंतन में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यूरोप–केंद्रित समाज अवधारणाओं की आलोचना से जुड़ा है। दिपेश चक्रवर्ती जैसे विद्वान तर्क देते हैं कि आधुनिकता, नागरिक समाज और धर्मनिरपेक्षता जैसी अवधारणाओं को गैर–पश्चिमी समाजों पर बिना आलोचना लागू नहीं किया जा सकता।
इस दृष्टि से भारतीय समाज को यूरोपीय समाज का अपूर्ण या विलंबित रूप नहीं माना जा सकता। वह एक विशिष्ट ऐतिहासिक पथ का परिणाम है, जिसे उपनिवेशवाद, सांस्कृतिक बहुलता और स्थानीय परंपराओं ने आकार दिया है। यह आलोचना समाज को बहुवचन और संदर्भ–आधारित रूप में समझने की माँग करती है।
निष्कर्ष : सांस्कृतिक–राजनीतिक प्रक्रिया के रूप में समाज
इस इकाई में विकसित समाज की अवधारणा स्थिर, संरचनात्मक या केवल संस्थागत परिभाषाओं से आगे जाती है। समाज एक गतिशील, विवादित और सांस्कृतिक रूप से मध्यस्थित प्रक्रिया के रूप में सामने आता है, जिसे इतिहास, सत्ता और अर्थ निरंतर आकार देते हैं।
संस्कृति, विमर्श और पहचान को केंद्र में रखकर यह दृष्टिकोण यह समझने में सहायता करता है कि राजनीति रोज़मर्रा के जीवन में कैसे कार्य करती है। समाज राजनीति की पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि उसका एक प्रमुख क्षेत्र है। यही वैचारिक ढाँचा आगे की इकाइयों—आधुनिक आत्म, राष्ट्रवाद, प्रतिरोध और शहरी संस्कृति—को समझने का आधार प्रदान करता है।
संदर्भ (References)
- चक्रवर्ती, दिपेश, यूरोप का प्रांतीयकरण (Provincializing Europe)
- मोहन्टी, जे. एन., द सेल्फ एंड इट्स अदर
- सेन, अमर्त्य, द आर्ग्युमेंटेटिव इंडिया
- मार्क्स, कार्ल, चयनित लेखन
- वेबर, मैक्स, इकोनॉमी एंड सोसाइटी
- दुर्खीम, एमिल, द रूल्स ऑफ़ सोशियोलॉजिकल मेथड