राजनीतिक अर्थव्यवस्था (Political Economy)
भूमिका
राजनीतिक अर्थव्यवस्था राजनीतिक विज्ञान की सबसे पुरानी, गहन और प्रभावशाली बौद्धिक परंपराओं में से एक है। यह दृष्टिकोण राजनीति और अर्थव्यवस्था के बीच पारस्परिक संबंधों का अध्ययन करता है और इस बात पर बल देता है कि आर्थिक प्रक्रियाएँ कभी भी राजनीति से स्वतंत्र नहीं होतीं। राज्य की शक्ति, संस्थाएँ, सामाजिक वर्ग और हित समूह आर्थिक निर्णयों को आकार देते हैं, जबकि आर्थिक संरचनाएँ राजनीतिक सत्ता, नीति-निर्माण और शासन की प्रकृति को प्रभावित करती हैं।

तुलनात्मक राजनीति में राजनीतिक अर्थव्यवस्था का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह विभिन्न समाजों में विकास, असमानता, राज्य की भूमिका और वैश्वीकरण के अलग-अलग अनुभवों की व्याख्या करने में सक्षम है। यह दृष्टिकोण केवल संस्थागत तुलना तक सीमित नहीं रहता, बल्कि राजनीतिक शक्ति के भौतिक आधारों को उजागर करता है।
राजनीतिक अर्थव्यवस्था की वैचारिक आधारभूमि
राजनीतिक अर्थव्यवस्था केवल आर्थिक नीतियों का अध्ययन नहीं है, बल्कि यह इस प्रश्न का विश्लेषण करती है कि संसाधनों का वितरण कैसे होता है, किसके पक्ष में होता है और किन राजनीतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से होता है। यह बाजार, राज्य और समाज के बीच जटिल अंतःक्रियाओं को केंद्र में रखती है।
यह दृष्टिकोण इस धारणा को अस्वीकार करता है कि बाजार अपने-आप में स्वायत्त और आत्म-नियंत्रित होते हैं। संपत्ति अधिकारों का संरक्षण, अनुबंधों का प्रवर्तन और आर्थिक स्थिरता—all राजनीतिक संस्थाओं और सत्ता पर निर्भर करते हैं। इस प्रकार राजनीतिक अर्थव्यवस्था राजनीति और अर्थव्यवस्था के कृत्रिम विभाजन को चुनौती देती है।
शास्त्रीय राजनीतिक अर्थव्यवस्था
राजनीतिक अर्थव्यवस्था की उत्पत्ति एडम स्मिथ, डेविड रिकार्डो और कार्ल मार्क्स जैसे शास्त्रीय चिंतकों के कार्यों में निहित है। इन विचारकों ने उत्पादन, वितरण और संचय की प्रक्रियाओं को राजनीतिक और सामाजिक संदर्भों में समझने का प्रयास किया।
एडम स्मिथ को अक्सर मुक्त बाजार का समर्थक माना जाता है, परंतु उन्होंने राज्य की भूमिका को कभी नकारा नहीं। उन्होंने न्याय, रक्षा और सार्वजनिक कार्यों में राज्य के हस्तक्षेप को आवश्यक माना। रिकार्डो ने वर्गों के बीच वितरणात्मक संघर्ष—भूमिपतियों, पूँजीपतियों और श्रमिकों—पर बल दिया।
कार्ल मार्क्स ने राजनीतिक अर्थव्यवस्था को एक क्रांतिकारी दिशा दी। उनके अनुसार आर्थिक संरचना समाज की राजनीतिक और कानूनी संरचनाओं को निर्धारित करती है। पूँजीवाद वर्ग संघर्ष, शोषण और असमानता पर आधारित है। मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थव्यवस्था ने साम्राज्यवाद, निर्भरता और वैश्विक पूँजीवाद के अध्ययन को गहराई प्रदान की।
उदारवादी और नव-शास्त्रीय राजनीतिक अर्थव्यवस्था
बीसवीं सदी में राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर उदारवादी और नव-शास्त्रीय अर्थशास्त्र का प्रभाव बढ़ा। इस दृष्टिकोण में बाजार को कुशल और तर्कसंगत माना गया तथा राज्य के हस्तक्षेप को विकृति के रूप में देखा गया। व्यक्ति को स्वार्थ-साधक और उपयोगिता-अधिकतम करने वाला अभिनेता माना गया।
पब्लिक चॉइस सिद्धांत ने राजनीति को भी इसी तर्क के तहत समझने का प्रयास किया और राजनेताओं तथा नौकरशाहों को स्वार्थी अभिनेता के रूप में चित्रित किया। यद्यपि इस दृष्टिकोण ने विश्लेषण में स्पष्टता प्रदान की, लेकिन इसकी आलोचना इस आधार पर हुई कि यह शक्ति-संबंधों, ऐतिहासिक संदर्भों और सामाजिक असमानताओं को नज़रअंदाज़ करता है।
मार्क्सवादी और आलोचनात्मक राजनीतिक अर्थव्यवस्था
मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थव्यवस्था तुलनात्मक राजनीति में एक केंद्रीय स्थान रखती है। यह पूँजीवाद को एक ऐतिहासिक रूप से विशिष्ट और अंतर्विरोधों से भरी प्रणाली के रूप में देखती है। राज्य को पूँजीवादी संचय की रक्षा करने वाली संस्था के रूप में समझा जाता है।
निर्भरता सिद्धांत और विश्व-प्रणाली विश्लेषण जैसे नव-मार्क्सवादी दृष्टिकोणों ने वैश्विक स्तर पर असमानता की व्याख्या की। इमैनुएल वालरस्टीन के अनुसार, विश्व पूँजीवादी प्रणाली केंद्र, अर्ध-परिधि और परिधि क्षेत्रों के बीच असमान संबंध उत्पन्न करती है। इस दृष्टिकोण में अविकास को विकास की प्रारंभिक अवस्था नहीं, बल्कि वैश्विक शोषण का परिणाम माना गया।
संस्थागत राजनीतिक अर्थव्यवस्था
संस्थागत राजनीतिक अर्थव्यवस्था राजनीति और अर्थशास्त्र के बीच सेतु का कार्य करती है। यह इस बात पर बल देती है कि आर्थिक प्रदर्शन और विकास संस्थागत संरचनाओं—जैसे कानून, नौकरशाही, राजनीतिक गठबंधन और नीतिगत ढाँचों—पर निर्भर करते हैं।
तुलनात्मक राजनीतिक अर्थव्यवस्था में कल्याणकारी राज्यों, पूँजीवाद के विविध रूपों और विकास मॉडलों के अध्ययन में इस दृष्टिकोण का व्यापक प्रयोग हुआ है। यह दिखाता है कि समान बाजार तंत्र अलग-अलग राजनीतिक संस्थाओं में भिन्न परिणाम उत्पन्न करते हैं।
विकास की राजनीतिक अर्थव्यवस्था
विकास अध्ययन में राजनीतिक अर्थव्यवस्था का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। यह विकास को केवल आर्थिक वृद्धि नहीं, बल्कि सत्ता, नीति और सामाजिक संघर्षों की प्रक्रिया के रूप में देखता है।
पूर्वी एशियाई देशों का विकासात्मक राज्य मॉडल इस बात का उदाहरण है कि मजबूत राज्य, रणनीतिक औद्योगिक नीति और नौकरशाही क्षमता किस प्रकार तीव्र आर्थिक परिवर्तन ला सकती है। इसके विपरीत, कमजोर राज्य और किराया-खोजी अभिजात वर्ग विकास में बाधक सिद्ध होते हैं।
वैश्विक राजनीतिक अर्थव्यवस्था
वैश्विक राजनीतिक अर्थव्यवस्था राष्ट्र-राज्य की सीमाओं से परे जाकर अंतरराष्ट्रीय व्यापार, वित्त, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और वैश्विक संस्थाओं का विश्लेषण करती है। यह वैश्वीकरण के प्रभावों—संप्रभुता, श्रम बाजार और असमानता—को समझने का प्रयास करती है।
आईएमएफ, विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाओं की भूमिका पर गंभीर बहस होती रही है। आलोचकों का तर्क है कि ये संस्थाएँ नव-उदारवादी नीतियों को बढ़ावा देती हैं, जिससे सामाजिक सुरक्षा कमजोर होती है।
तुलनात्मक राजनीति में राजनीतिक अर्थव्यवस्था
तुलनात्मक राजनीतिक विश्लेषण में राजनीतिक अर्थव्यवस्था यह स्पष्ट करती है कि आर्थिक परिणाम न तो स्वाभाविक होते हैं और न ही अपरिहार्य। वे राजनीतिक निर्णयों, संस्थागत संरचनाओं और सत्ता-संतुलन का परिणाम होते हैं।
चुनावी प्रणालियाँ, पार्टी प्रतिस्पर्धा और हित समूह नीति-निर्माण को गहराई से प्रभावित करते हैं। इस दृष्टिकोण से लोकतांत्रिक क्षरण, लोकलुभावनवाद और बढ़ती असमानता को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है।
आलोचनाएँ और सीमाएँ
राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर यह आलोचना की जाती है कि कुछ रूपों में यह आर्थिक निर्धारणवाद की ओर झुक जाती है और राजनीति की स्वायत्तता को कम कर देती है। इसके अतिरिक्त, संस्कृति, पहचान और विचारधारा जैसे कारकों को पर्याप्त महत्व न देने का आरोप भी लगाया गया है।
फिर भी समकालीन राजनीतिक अर्थव्यवस्था इन सीमाओं को स्वीकार करते हुए अंतर्विषयी और बहु-पद्धतिगत दृष्टिकोण अपना रही है।
समकालीन प्रासंगिकता
आर्थिक संकट, वैश्वीकरण, जलवायु परिवर्तन और डिजिटल पूँजीवाद के युग में राजनीतिक अर्थव्यवस्था की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। यह नीति विकल्पों के सामाजिक परिणामों का आलोचनात्मक मूल्यांकन करने का उपकरण प्रदान करती है।
निष्कर्ष
राजनीतिक अर्थव्यवस्था राजनीति और अर्थव्यवस्था के गहरे अंतर्संबंधों को समझने का एक व्यापक और सशक्त दृष्टिकोण है। यह सत्ता, संस्थाओं और भौतिक हितों को एकीकृत करके राजनीतिक जीवन की जटिलताओं को उजागर करती है।
तुलनात्मक राजनीतिक विश्लेषण के विद्यार्थियों के लिए यह दृष्टिकोण अनिवार्य है, क्योंकि यह दिखाता है कि राजनीतिक प्रक्रियाएँ आर्थिक संरचनाओं से कैसे जुड़ी होती हैं और सामाजिक परिणामों को कैसे आकार देती हैं।
संदर्भ / सुझाई गई पुस्तकें
- एडम स्मिथ – The Wealth of Nations
- कार्ल मार्क्स – Capital
- रॉबर्ट गिलपिन – The Political Economy of International Relations
- पीटर हॉल एवं डेविड सॉस्किस – Varieties of Capitalism
- हा-जून चांग – Kicking Away the Ladder
- इमैनुएल वालरस्टीन – The Modern World-System
FAQs
1. राजनीतिक अर्थव्यवस्था क्या है?
यह राजनीति और अर्थव्यवस्था के बीच अंतर्संबंधों का अध्ययन है, जिसमें सत्ता, संसाधन और वितरण पर ध्यान दिया जाता है।
2. राजनीतिक अर्थव्यवस्था और अर्थशास्त्र में क्या अंतर है?
राजनीतिक अर्थव्यवस्था आर्थिक प्रक्रियाओं को राजनीतिक और सामाजिक संदर्भों में रखकर विश्लेषण करती है।
3. तुलनात्मक राजनीति में इसका क्या महत्व है?
यह विभिन्न देशों में विकास, असमानता और नीति-परिणामों के अंतर को समझने में सहायक है।
4. क्या यह दृष्टिकोण आज भी प्रासंगिक है?
हाँ, वैश्वीकरण, आर्थिक संकट और सामाजिक असमानता के अध्ययन में इसकी केंद्रीय भूमिका है।