राजतंत्र से संवैधानिक लोकतंत्र की ओर संक्रमण
(जम्मू और कश्मीर)
जम्मू और कश्मीर में राजतंत्र से संवैधानिक लोकतंत्र की ओर संक्रमण आधुनिक दक्षिण एशिया के सबसे जटिल राजनीतिक रूपांतरणों में से एक रहा है। यह परिवर्तन न तो सहज था और न ही क्रमिक। औपनिवेशिक हस्तक्षेप, रियासती निरंकुशता, जन–राजनीतिक mobilization और 1947 के बाद की विवादग्रस्त संप्रभुता—इन सभी कारकों ने मिलकर इस संक्रमण को अस्थिर, अपूर्ण और विवादास्पद बनाया।
अन्य क्षेत्रों के विपरीत, जहाँ लोकतांत्रिक संस्थाएँ सामाजिक प्रक्रियाओं के भीतर से विकसित हुईं, जम्मू और कश्मीर में यह संक्रमण ऐतिहासिक विघटन और राजनीतिक अनिश्चितता के बीच घटित हुआ।
राजतंत्र: सत्ता का पारंपरिक स्वरूप
संवैधानिक शासन से पूर्व जम्मू और कश्मीर में शासन का आधार वंशानुगत राजतंत्र था—विशेषतः 1846 से 1947 तक का डोगरा काल। इस व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ थीं—
- सत्ता का शासक में केंद्रीकरण
- जनभागीदारी का अभाव
- आज्ञाकारिता, पदानुक्रम और बल पर आधारित शासन
- जनता के प्रति न्यूनतम जवाबदेही
राज्य शासक की व्यक्तिगत सत्ता का विस्तार था। क़ानून, प्रशासन और न्याय लोक–सहमति से नहीं, बल्कि शाही अधिकार से संचालित होते थे। समाज को अधिकार–धारी नागरिकों के रूप में नहीं, बल्कि प्रजा के रूप में देखा जाता था। इससे राज्य–समाज के बीच गहरी दूरी बनी रही।
राजतांत्रिक वैधता का संकट
बीसवीं शताब्दी के आरंभ तक राजतंत्र की वैधता पर गंभीर प्रश्न उठने लगे। इसके पीछे कई कारण थे—
- कठोर कर और आर्थिक शोषण
- धार्मिक और सामाजिक भेदभाव
- शिक्षा और राजनीतिक चेतना का प्रसार
- वैश्विक लोकतांत्रिक और उपनिवेश–विरोधी विचारों का प्रभाव
राजतंत्र आधुनिक राजनीतिक अपेक्षाओं के संदर्भ में अप्रासंगिक और अन्यायपूर्ण प्रतीत होने लगा। परिणामस्वरूप, सुधार आंदोलनों और राजनीतिक विरोध ने शासक की निरंकुश सत्ता को खुली चुनौती दी।
जन–राजनीति और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का उदय
बीच के दशकों में संगठित राजनीतिक आंदोलनों ने—
- उत्तरदायी सरकार
- प्रतिनिधि संस्थाएँ
- विधि का शासन और नागरिक स्वतंत्रताएँ
जैसी माँगों को मुखर किया।
यह चरण समाज के प्रजा से राजनीतिक दावेदार बनने का था। अब माँग केवल शासक बदलने की नहीं, बल्कि राज्य के ढाँचे के पुनर्गठन की थी—जहाँ सत्ता का स्रोत जनता की इच्छा हो।
1947: एक निर्णायक राजनीतिक विघटन
1947 जम्मू और कश्मीर के राजनीतिक इतिहास में एक निर्णायक मोड़ था। ब्रिटिश भारत के विभाजन, युद्ध और भारत के साथ विलय ने संप्रभुता के अर्थ को ही बदल दिया।
राजतंत्र औपचारिक रूप से समाप्त हुआ और संवैधानिक लोकतंत्र की अवधारणा सामने आई—पर यह परिवर्तन असाधारण परिस्थितियों में हुआ—
- बाहरी संघर्ष और सुरक्षा संकट
- आंतरिक राजनीतिक अनिश्चितता
- आत्मनिर्णय और संप्रभुता पर प्रतिस्पर्धी दावे
इसलिए लोकतंत्र यहाँ किसी सामाजिक निरंतरता का स्वाभाविक परिणाम नहीं, बल्कि एक संविदात्मक और विवादग्रस्त व्यवस्था के रूप में उभरा।
संवैधानिक लोकतंत्र: आदर्श और वादे
1947 के बाद स्थापित नए ढाँचे ने—
- जन–संप्रभुता
- निर्वाचित प्रतिनिधि संस्थाएँ
- मौलिक अधिकार और नागरिक स्वतंत्रताएँ
- विधि का शासन
जैसे आदर्श प्रस्तुत किए।
यह राजतंत्र से एक बुनियादी विच्छेद था—जहाँ सत्ता अब व्यक्ति–केंद्रित नहीं, बल्कि संस्थागत और विधि–बद्ध मानी गई। सिद्धांततः प्रजा नागरिक बनी।
राजतांत्रिक अतीत की निरंतरताएँ
औपचारिक लोकतंत्र के बावजूद, राजतांत्रिक अतीत की कुछ प्रवृत्तियाँ बनी रहीं—
- सत्ता का केंद्रीकरण
- संस्थागत स्वायत्तता की कमजोरी
- सीमित राजनीतिक बहुलता
- बल–आधारित शासन की प्रवृत्ति
इन निरंतरताओं ने लोकतांत्रिक वादों को कमजोर किया और समाज में अलगाव की भावना को बनाए रखा।
सामाजिक जड़ों के बिना लोकतंत्र
संक्रमण की एक बड़ी चुनौती यह रही कि लोकतांत्रिक संस्थाएँ गहरी सामाजिक जड़ों के बिना स्थापित हुईं। लोकतंत्र संविधान के माध्यम से आया, न कि दीर्घकालिक नागरिक सहभागिता से।
इससे—
- औपचारिक लोकतांत्रिक संरचनाओं
- और जन–वैधता की अनुभूति
के बीच अंतर पैदा हुआ। चुनाव और संस्थाएँ विश्वास अर्जित करने में अक्सर असफल रहीं।
सहमति बनाम दमन
अपूर्ण संक्रमण के कारण राज्य ने कई बार सहमति के बजाय दमन पर निर्भरता दिखाई। जबकि लोकतंत्र स्वैच्छिक आज्ञापालन और वैधता पर टिकता है, दमन की अधिकता ने राज्य को एक थोपी गई सत्ता के रूप में प्रस्तुत किया—जो राजतांत्रिक स्मृतियों को पुनर्जीवित करती रही।
एक विवादग्रस्त परियोजना के रूप में लोकतंत्र
जम्मू और कश्मीर में संवैधानिक लोकतंत्र एक लगातार मोलभाव और विवाद का विषय रहा है। विभिन्न सामाजिक समूहों ने इसे अलग–अलग अर्थों में समझा—
- स्वशासन और स्वायत्तता के रूप में
- संघीय ढाँचे के भीतर सहभागिता के रूप में
- या बाहरी ढाँचे के रूप में जिसकी वैधता प्रश्नांकित है
ये भिन्न व्याख्याएँ संक्रमण की अपूर्णता को दर्शाती हैं।
निष्कर्ष
राजतंत्र से संवैधानिक लोकतंत्र की ओर संक्रमण ने जम्मू और कश्मीर को व्यक्तिगत शासन से संस्थागत शासन, प्रजा से नागरिक, और बल से विधि की ओर ले जाने का वादा किया। परंतु यह परिवर्तन पूर्ण नहीं हो सका।
इसके परिणामस्वरूप एक स्तरीकृत राजनीतिक व्यवस्था बनी, जहाँ लोकतांत्रिक रूप तो हैं, पर कई बार व्यवहार में दमनकारी प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं।
समकालीन वैधता–संकट, राजनीतिक असंतोष और संघर्ष को समझने के लिए इस अधूरे संक्रमण को समझना अनिवार्य है। आगे का रास्ता तभी प्रशस्त होगा जब संवैधानिक लोकतंत्र को लोक–सहमति, सामाजिक न्याय और वास्तविक राजनीतिक सहभागिता में गहराई से स्थापित किया जाएगा—ताकि ऐतिहासिक संक्रमण अपने तर्कसंगत निष्कर्ष तक पहुँच सके।
संदर्भ (References)
- Bose, Sumantra. Kashmir: Roots of Conflict, Paths to Peace
- Zutshi, Chitralekha. Languages of Belonging
- Rai, Mridu. Hindu Rulers, Muslim Subjects
- Schofield, Victoria. Kashmir in Conflict