मानव अधिकार – मुद्दे, चुनौतियाँ और समकालीन सरोकार: बच्चे
(भारतीय संदर्भ)
बच्चे समाज का सबसे अधिक संवेदनशील और आश्रित वर्ग होते हैं, इसलिए मानव अधिकार विमर्श में उनका स्थान अत्यंत केंद्रीय है। वयस्कों के विपरीत, बच्चे अपने अस्तित्व, विकास और संरक्षण के लिए परिवार, समाज और राज्य पर निर्भर रहते हैं। इसी कारण बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन अक्सर उन संस्थाओं के भीतर होता है जिन्हें संरक्षण का माध्यम माना जाता है—जैसे परिवार, विद्यालय, कार्यस्थल और समुदाय।
भारतीय संदर्भ में बच्चों के मानव अधिकार गरीबी, असमानता, सामाजिक मानदंडों, राज्य की जिम्मेदारी और विकास की प्राथमिकताओं से गहराई से जुड़े हैं। संवैधानिक प्रावधानों और क़ानूनी ढाँचों के बावजूद, बड़ी संख्या में बच्चे आज भी वंचना, शोषण और हिंसा का सामना कर रहे हैं, जिससे बच्चों के अधिकार समकालीन भारत में एक गंभीर मानव अधिकार चुनौती बने हुए हैं।
अधिकार-धारी व्यक्तियों के रूप में बच्चे
आधुनिक मानव अधिकार दृष्टिकोण बच्चों को केवल देखभाल के पात्र नहीं, बल्कि अधिकार-धारी व्यक्तियों के रूप में मान्यता देता है। बच्चों के मूल अधिकारों में शामिल हैं—
- जीवन और अस्तित्व का अधिकार
- विकास और शिक्षा का अधिकार
- शोषण, उपेक्षा और हिंसा से संरक्षण
- गरिमा और सहभागिता का अधिकार
यह दृष्टिकोण बच्चों को निष्क्रिय आश्रित मानने के बजाय उनकी विकसित होती क्षमताओं (evolving capacities) को स्वीकार करता है। भारत में, हालांकि यह अवधारणा क़ानूनों में मौजूद है, पर सामाजिक व्यवहार में बच्चों की स्वायत्तता और गरिमा को अभी भी सीमित रूप में ही स्वीकार किया जाता है।
संवैधानिक और क़ानूनी ढाँचा
भारत में बच्चों के अधिकारों की नींव Constitution of India में निहित है। संविधान प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से बच्चों को—
- क़ानून के समक्ष समानता और भेदभाव से मुक्ति
- जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण
- खतरनाक कार्यों में बाल श्रम का निषेध
- शिक्षा और कल्याण को बढ़ावा
प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त, विभिन्न क़ानून और नीतियाँ बच्चों के संरक्षण, शिक्षा और पुनर्वास के लिए बनाई गई हैं। फिर भी, क़ानून और क्रियान्वयन के बीच अंतर बच्चों के अधिकारों की प्राप्ति में एक बड़ी बाधा बना हुआ है।
जीवन, स्वास्थ्य और पोषण का अधिकार
बच्चों के मानव अधिकारों से जुड़ी सबसे बुनियादी चिंता है जीवन और अस्तित्व का अधिकार। भारत में कुपोषण, अपर्याप्त स्वास्थ्य सेवाएँ, असुरक्षित आवास और स्वच्छता की कमी आज भी लाखों बच्चों को प्रभावित करती हैं।
कुपोषण और खराब स्वास्थ्य केवल बच्चों के जीवन को ही नहीं, बल्कि उनके शारीरिक और मानसिक विकास को भी बाधित करता है। मानव अधिकार दृष्टिकोण से यह केवल व्यक्तिगत विफलता नहीं, बल्कि संरचनात्मक हिंसा का परिणाम है, जो गरीबी और सामाजिक असमानताओं में निहित है।
शिक्षा और समग्र विकास का अधिकार
शिक्षा बच्चों के मानव अधिकारों की पूर्ति का केंद्रीय साधन है। यह उन्हें क्षमताओं के विकास, सामाजिक सहभागिता और वंचना के चक्र से बाहर निकलने का अवसर प्रदान करती है।
हालाँकि शिक्षा को क़ानूनी अधिकार का दर्जा मिला है, फिर भी कई चुनौतियाँ बनी हुई हैं—
- शिक्षा की गुणवत्ता में असमानता
- विद्यालय छोड़ने की ऊँची दर
- जाति और लिंग आधारित भेदभाव
- डिजिटल संसाधनों तक असमान पहुँच
जब शिक्षा असमान या अपूर्ण होती है, तो वह सामाजिक असमानताओं को और मज़बूत करती है, जिससे मानव अधिकारों की मूल भावना कमजोर पड़ती है।
बाल श्रम और आर्थिक शोषण
बाल श्रम बच्चों के मानव अधिकारों का सबसे स्पष्ट और गंभीर उल्लंघन है। आर्थिक विवशता, सामाजिक स्वीकृति और क़ानूनों के कमजोर प्रवर्तन के कारण बाल श्रम आज भी अनेक क्षेत्रों में बना हुआ है।
बाल श्रम—
- शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन करता है
- स्वास्थ्य और विकास को क्षति पहुँचाता है
- बच्चों की गरिमा को नकारता है
मानव अधिकार दृष्टिकोण से बाल श्रम को केवल परिवार की समस्या नहीं, बल्कि व्यवस्थित सामाजिक–आर्थिक अन्याय के रूप में समझा जाना चाहिए।
हिंसा, दुर्व्यवहार और शोषण
बच्चे शारीरिक, मानसिक और यौन हिंसा के प्रति विशेष रूप से असुरक्षित होते हैं। ऐसी हिंसा अक्सर निजी क्षेत्रों में घटित होती है, जिससे पहचान और जवाबदेही कठिन हो जाती है।
मानव अधिकार सरोकारों में शामिल हैं—
- घरेलू हिंसा और उपेक्षा
- यौन शोषण और तस्करी
- संस्थागत हिंसा
बच्चों के विरुद्ध हिंसा उनकी गरिमा, सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य को गहरे स्तर पर प्रभावित करती है और इसके दीर्घकालिक परिणाम होते हैं।
विशेष रूप से संवेदनशील परिस्थितियों में बच्चे
कुछ वर्गों के बच्चे मानव अधिकार उल्लंघनों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, जैसे—
- सड़क पर रहने वाले बच्चे
- प्रवासन और विस्थापन से प्रभावित बच्चे
- हाशिए पर स्थित समुदायों के बच्चे
- दिव्यांग बच्चे
इनकी स्थिति यह दर्शाती है कि बच्चों के अधिकार जाति, वर्ग, लिंग और सामाजिक बहिष्करण जैसे व्यापक प्रश्नों से जुड़े हुए हैं।
राज्य की जिम्मेदारी और संस्थागत चुनौतियाँ
बच्चों के मानव अधिकारों की रक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य पर है। इसमें शामिल है—
- प्रभावी क़ानून और उनका प्रवर्तन
- शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण सेवाओं की उपलब्धता
- संरक्षण और पुनर्वास तंत्र
फिर भी, अपर्याप्त संसाधन, प्रशिक्षित कर्मियों की कमी, कमजोर निगरानी और प्रशासनिक विलंब बच्चों के अधिकारों की वास्तविक प्राप्ति में बाधा बनते हैं।
समकालीन चुनौतियाँ और नए सरोकार
आज बच्चों के मानव अधिकार नए संदर्भों में उभर रहे हैं—
- डिजिटल माध्यमों में शोषण और ऑनलाइन उत्पीड़न
- आर्थिक संकटों का बच्चों पर असमान प्रभाव
- तकनीक और शिक्षा तक असमान पहुँच
- बच्चों और किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ
ये चुनौतियाँ मानव अधिकार नीतियों के निरंतर अद्यतन की माँग करती हैं।
लोकतंत्र, समाज और बच्चों के अधिकार
बच्चों के अधिकार लोकतंत्र की गुणवत्ता से सीधे जुड़े हैं। जो समाज अपने बच्चों की रक्षा और विकास में विफल रहता है, वह अपने भविष्य को कमजोर करता है।
मानव अधिकार दृष्टिकोण यह भी मानता है कि बच्चों की आयु-उपयुक्त सहभागिता सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि उनसे जुड़े निर्णयों में उनकी आवाज़ सुनी जा सके।
निष्कर्ष
भारत में बच्चों के मानव अधिकार समकालीन राजनीति और शासन की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक हैं। संवैधानिक और क़ानूनी ढाँचे मज़बूत हैं, किंतु सामाजिक असमानताएँ, आर्थिक दबाव और संस्थागत कमजोरियाँ करोड़ों बच्चों को उनके मूल अधिकारों से वंचित रखती हैं।
भारतीय अनुभव यह स्पष्ट करता है कि बच्चों के मानव अधिकारों की रक्षा केवल क़ानूनों से संभव नहीं है। इसके लिए सतत सार्वजनिक निवेश, सामाजिक जागरूकता, संस्थागत जवाबदेही और समानता के प्रति प्रतिबद्धता आवश्यक है। बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा केवल नैतिक या क़ानूनी दायित्व नहीं, बल्कि एक न्यायपूर्ण, लोकतांत्रिक और मानवीय समाज के निर्माण की पूर्वशर्त है।
संदर्भ (References)
- Sen, Amartya. Development as Freedom
- Nussbaum, Martha. Creating Capabilities
- Bajpai, Asha. Child Rights in India
- Constitution of India
- UNICEF, State of the World’s Children Reports