भारत और इज़राइल में दल–राजनीति: लोकसभा और कनेस्सेट का कार्यकरण
(Party Politics in India and Israel: Working of the Lok Sabha & the Knesset)
संसदीय लोकतंत्र में दल–राजनीति उसकी कार्यप्रणाली की केंद्रीय धुरी होती है। संसद केवल क़ानून बनाने की संस्था नहीं, बल्कि वह वह मंच है जहाँ राजनीतिक दल प्रतिस्पर्धा करते हैं, सहयोग और सौदेबाज़ी करते हैं तथा सत्ता का प्रयोग करते हैं। इसलिए किसी संसद का कार्यकरण उसके दल-तंत्र, चुनावी प्रणाली और गठबंधन राजनीति से अलग करके नहीं समझा जा सकता।
India और Israel—दोनों में दल–राजनीति उनकी विधायिकाओं, अर्थात् लोकसभा और कनेस्सेट, के कामकाज को निर्णायक रूप से आकार देती है।
यह इकाई भारत और इज़राइल में दल–राजनीति की तुलना करते हुए यह विश्लेषण करती है कि लोकसभा और कनेस्सेट किस प्रकार कार्य करते हैं।
संसदीय कार्यकरण में दल–राजनीति की भूमिका
संसदीय प्रणाली में राजनीतिक दल निम्नलिखित प्रमुख भूमिकाएँ निभाते हैं—
- सामाजिक हितों और पहचानों का प्रतिनिधित्व
- सरकार और विपक्ष का गठन
- विधायी बहसों और मतदान को संरचित करना
- कार्यपालिका को उत्तरदायी बनाना
इसलिए संसद की स्थिरता और प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि दल-अनुशासन कितना मज़बूत है, गठबंधन कैसे बनते हैं और सरकार–विपक्ष के बीच संतुलन कैसा है।
लोकसभा: भारतीय संसद में दल–राजनीति
लोकसभा भारतीय संसद का निचला सदन है और राष्ट्रीय दल–राजनीति का मुख्य केंद्र है। इसके सदस्य प्रथम-पास-द-पोस्ट (First Past the Post) प्रणाली से चुने जाते हैं, जो बड़े दलों को बढ़त देती है और मतों के समेकन को प्रोत्साहित करती है।
भारतीय दल–राजनीति का विकास तीन प्रमुख चरणों में देखा जा सकता है—
एकदलीय प्रभुत्व का दौर, प्रतिस्पर्धी बहुदलीय राजनीति, और वर्तमान गठबंधन युग। इन चरणों ने लोकसभा के कार्यकरण को अलग-अलग रूपों में प्रभावित किया है।
बहुमत सरकार और विपक्ष की भूमिका
जब लोकसभा में किसी एक दल या पूर्व-चुनावी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलता है, तब सरकार अपेक्षाकृत स्थिर रहती है। सत्तारूढ़ दल विधायी एजेंडा तय करता है, जबकि विपक्ष बहस, प्रश्नकाल और संसदीय निगरानी के माध्यम से सरकार को जवाबदेह बनाता है।
भारत में दल–अनुशासन क़ानूनी और संस्थागत रूप से काफ़ी मज़बूत है, जिससे सांसदों का मतदान दल-रेखा के अनुरूप रहता है। इससे शासन-स्थिरता तो बढ़ती है, लेकिन कई बार विधायी विमर्श की स्वतंत्रता सीमित हो जाती है।
गठबंधन राजनीति और विधायी सौदेबाज़ी
जब लोकसभा में गठबंधन सरकारें बनती हैं, तब दल–राजनीति अधिक संविदात्मक और बहुलतावादी हो जाती है। क्षेत्रीय और छोटे दल सरकार-निर्माण तथा नीति-निर्धारण में प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं।
इसका प्रभाव यह होता है कि—
- विधायी प्रक्रिया में सौदेबाज़ी बढ़ती है
- संसदीय समितियों की भूमिका सशक्त होती है
- क्षेत्रीय और पहचान-आधारित मुद्दों को अधिक स्थान मिलता है
इस प्रकार लोकसभा में दल–राजनीति भारत की सामाजिक विविधता और संघीय ढाँचे को प्रतिबिंबित करती है।
कनेस्सेट: इज़राइल की संसद में दल–राजनीति
कनेस्सेट इज़राइल की एकसदनीय विधायिका है, जिसके सदस्य समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत चुने जाते हैं। पूरा देश एक ही निर्वाचन क्षेत्र होता है, जिसके परिणामस्वरूप अनेक छोटे और वैचारिक दल संसद में प्रवेश करते हैं।
इस प्रणाली ने कनेस्सेट को अत्यधिक खंडित बना दिया है, जहाँ कोई भी दल अकेले बहुमत प्राप्त नहीं कर पाता। इसलिए गठबंधन सरकारें यहाँ अनिवार्य हैं।
गठबंधन सरकारें और राजनीतिक अस्थिरता
इज़राइल में दल–राजनीति का केंद्रबिंदु चुनाव के बाद होने वाली गठबंधन वार्ताएँ होती हैं। छोटे दल अक्सर “किंगमेकर” की भूमिका निभाते हैं और सरकार को समर्थन देने के बदले नीतिगत रियायतें प्राप्त करते हैं।
इससे—
- विधायी एजेंडा गठबंधन समझौतों से तय होता है
- नीति-निर्माण सरकार के अस्तित्व पर निर्भर रहता है
- सरकारें जल्दी गिरने की आशंका बनी रहती है
कनेस्सेट का कार्यकरण इसलिए निरंतर राजनीतिक मोलभाव की स्थिति में रहता है।
दल–अनुशासन और संसदीय बहस
कनेस्सेट में दल–अनुशासन भारत की तुलना में अपेक्षाकृत कमज़ोर है। गठबंधन सहयोगियों के बीच वैचारिक मतभेद अक्सर खुलकर सामने आते हैं।
यद्यपि इससे संसदीय बहस जीवंत और तीव्र बनती है, पर दीर्घकालिक नीति-निर्धारण और स्थिर शासन में बाधाएँ भी उत्पन्न होती हैं।
प्रतिनिधित्व और सामाजिक विविधता
दोनों संसदों में दल–राजनीति सामाजिक विविधता के प्रतिनिधित्व का माध्यम है।
भारत में लोकसभा क्षेत्रीय, जाति-आधारित और वैचारिक दलों के माध्यम से विविधता को समाहित करती है। बड़े दल और गठबंधन सामाजिक समूहों को व्यापक ढाँचे में जोड़ते हैं।
इज़राइल में समानुपातिक प्रतिनिधित्व धार्मिक, जातीय और वैचारिक अल्पसंख्यकों को प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व देता है, लेकिन इसके परिणामस्वरूप शासन-प्रणाली अधिक खंडित हो जाती है।
कार्यपालिका की जवाबदेही
दोनों प्रणालियों में सरकार संसद के समर्थन पर निर्भर करती है।
भारत में स्थिर बहुमत सरकारें अक्सर कार्यपालिका को मज़बूत बनाती हैं, हालाँकि विपक्ष और समितियाँ निगरानी का कार्य करती हैं।
इज़राइल में गठबंधन टूटने का निरंतर खतरा संसद को कार्यपालिका पर अधिक प्रभाव देता है, लेकिन इससे राजनीतिक अनिश्चितता भी बढ़ती है।
तुलनात्मक निष्कर्ष
- लोकसभा स्थिरता और मत-समेकन को प्राथमिकता देती है; कनेस्सेट प्रतिनिधित्व और बहुलता को
- भारत में दल–अनुशासन अधिक मज़बूत है; इज़राइल में अपेक्षाकृत ढीला
- भारत में गठबंधन राजनीति संघीय समायोजन का साधन है; इज़राइल में वैचारिक–धार्मिक सौदेबाज़ी का
इन अंतरों के बावजूद, दोनों संसदें यह दिखाती हैं कि संसदीय लोकतंत्र में दल–राजनीति केंद्रीय भूमिका निभाती है।
निष्कर्ष
लोकसभा और कनेस्सेट का तुलनात्मक अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि संसदीय कार्यकरण केवल संस्थागत ढाँचे पर निर्भर नहीं करता, बल्कि दल-प्रणाली, चुनावी नियमों और सामाजिक विभाजनों से गहराई से प्रभावित होता है।
भारत में लोकसभा दल–राजनीति के माध्यम से स्थिर शासन और सामाजिक विविधता के बीच संतुलन साधती है, जबकि इज़राइल में कनेस्सेट व्यापक प्रतिनिधित्व तो सुनिश्चित करती है, पर निरंतर गठबंधन अस्थिरता से जूझती है।
इस प्रकार, दोनों अनुभव यह सिद्ध करते हैं कि लोकतंत्र का व्यवहारिक रूप उसकी दल–राजनीति से ही आकार ग्रहण करता है।
संदर्भ (References)
- Lijphart, Arend. Patterns of Democracy
- Sartori, Giovanni. Parties and Party Systems
- Kohli, Atul. Democracy and Discontent
- Shindler, Colin. A History of Modern Israel
- Yadav, Yogendra. State Politics in India