राज्य संरचना और संस्थाएँ: राज्य–निर्माण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
(State Structures and Institutions: State Formation – Historical Background)
भारत और इज़राइल
किसी भी राज्य की संरचना और उसकी संस्थाओं को समझने के लिए उसके ऐतिहासिक राज्य–निर्माण (state formation) की प्रक्रिया का अध्ययन अनिवार्य है। राज्य–निर्माण उस दीर्घकालिक ऐतिहासिक प्रक्रिया को दर्शाता है, जिसके माध्यम से राजनीतिक सत्ता का केंद्रीकरण होता है, वैधता स्थापित होती है और शासन की संस्थाएँ विकसित होती हैं। तुलनात्मक राजनीति के दृष्टिकोण से यह स्पष्ट होता है कि राज्य–निर्माण का कोई एक सार्वभौमिक मॉडल नहीं होता; बल्कि यह औपनिवेशिक अनुभव, राष्ट्रवादी आंदोलनों, युद्ध, प्रवासन और अंतरराष्ट्रीय राजनीति जैसे कारकों से आकार ग्रहण करता है।
इस संदर्भ में India और Israel दो भिन्न ऐतिहासिक मार्ग प्रस्तुत करते हैं। दोनों आधुनिक राज्य बीसवीं शताब्दी के मध्य में अस्तित्व में आए, किंतु उनके राज्य–निर्माण की परिस्थितियाँ और प्रक्रियाएँ मूलतः अलग थीं। भारत का राज्य–निर्माण औपनिवेशिक शासन और राष्ट्रवादी संघर्ष से जुड़ा था, जबकि इज़राइल का राज्य–निर्माण बसावादी राष्ट्रवाद, विस्थापन और निरंतर संघर्ष के संदर्भ में हुआ।
तुलनात्मक दृष्टि से राज्य–निर्माण
शास्त्रीय राजनीतिक सिद्धांतों में राज्य–निर्माण को प्रायः क्षेत्रीय संप्रभुता, वैध हिंसा के एकाधिकार और नौकरशाही प्रशासन के विकास से जोड़ा जाता है। किंतु तुलनात्मक विश्लेषण यह दिखाता है कि राज्य–निर्माण की प्रक्रिया ऐतिहासिक रूप से विशिष्ट और संदर्भ–निर्भर होती है।
भारत और इज़राइल के मामले में यह अंतर विशेष रूप से स्पष्ट है। जहाँ भारत में आधुनिक राज्य औपनिवेशिक संस्थाओं के लोकतांत्रिक रूपांतरण से उभरा, वहीं इज़राइल में राज्य–निर्माण राष्ट्र–निर्माण, युद्ध और आपात स्थितियों के साथ-साथ आगे बढ़ा।
भारत में राज्य–निर्माण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत का आधुनिक राज्य–निर्माण ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से गहराई से जुड़ा हुआ है। औपनिवेशिक राज्य ने एक केंद्रीकृत प्रशासन, संहिताबद्ध क़ानून, आधुनिक नौकरशाही और एकीकृत राजस्व प्रणाली स्थापित की। भारतीय सिविल सेवा, न्यायपालिका और केंद्रीय प्रशासनिक ढाँचे ने स्वतंत्र भारत के राज्य की संस्थागत नींव रखी।
हालाँकि औपनिवेशिक शासन लोकतांत्रिक वैधता से वंचित और शोषणकारी था। उसने भारतीय समाज को राजनीतिक भागीदारी से दूर रखा और सत्ता को ऊपर से थोपे गए रूप में संचालित किया। इस विरोधाभास ने ही राष्ट्रवादी आंदोलन को जन्म दिया, जिसने औपनिवेशिक राज्य के विरुद्ध व्यापक जन–आधार वाला संघर्ष खड़ा किया।
राष्ट्रवादी आंदोलन और लोकतांत्रिक राज्य का उदय
भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन ने राज्य–निर्माण की प्रक्रिया को निर्णायक रूप से प्रभावित किया। इस आंदोलन की विशेषता यह थी कि उसने बड़े पैमाने पर संवैधानिकता, प्रतिनिधित्व और जन–भागीदारी पर ज़ोर दिया। स्वतंत्रता के समय तक भारत के पास—
- एक कार्यशील प्रशासनिक ढाँचा
- विधायी संस्थाओं का अनुभव
- राष्ट्रीय स्तर का राजनीतिक नेतृत्व
पहले से मौजूद था।
1950 में लागू संविधान ने राज्य–निर्माण को लोकतांत्रिक आधार प्रदान किया। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, संघवाद, स्वतंत्र न्यायपालिका और मौलिक अधिकारों को राज्य के जन्म के साथ ही अपनाया गया। इस प्रकार भारत का राज्य–निर्माण औपनिवेशिक विरासत और लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद के संयोजन के रूप में सामने आया।
भारत में राष्ट्र–निर्माण और राज्य की संरचना
स्वतंत्रता और विभाजन के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक अत्यंत विविध समाज को एकजुट रखना था। राज्य–निर्माण यहाँ सांस्कृतिक समरूपता थोपने के बजाय समायोजन और बहुलता के सिद्धांत पर आधारित रहा।
भाषायी आधार पर राज्यों का पुनर्गठन, संघीय व्यवस्था और धर्मनिरपेक्षता—इन सबने भारतीय राज्य को समावेशी स्वरूप दिया। फिर भी औपनिवेशिक काल से चली आ रही केंद्रीकरण की प्रवृत्ति के कारण भारत में एक सशक्त केंद्र भी विकसित हुआ।
इज़राइल में राज्य–निर्माण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इज़राइल का राज्य–निर्माण भारत से बिल्कुल अलग ऐतिहासिक संदर्भ में हुआ। 1948 में इज़राइल की स्थापना ज़ायोनिस्ट आंदोलन की परिणति थी, जिसका उद्देश्य यहूदियों के लिए एक राष्ट्रीय मातृभूमि की स्थापना करना था। इज़राइल को न तो किसी सुसंगठित औपनिवेशिक राज्य की विरासत मिली और न ही स्थिर सीमाएँ।
राज्य की घोषणा के साथ ही युद्ध आरंभ हो गया, जिससे राज्य–निर्माण सुरक्षा और संघर्ष के माहौल में हुआ। परिणामस्वरूप, इज़राइल एक ऐसे राज्य के रूप में विकसित हुआ जहाँ राजनीतिक और सैन्य संस्थाएँ गहराई से जुड़ी हुई थीं।
पूर्व–राज्य संस्थाएँ और तीव्र संस्थागत सुदृढ़ीकरण
इज़राइल की एक विशिष्ट विशेषता यह थी कि स्वतंत्रता से पहले ही ज़ायोनिस्ट आंदोलन ने प्रशासनिक, सैन्य और कल्याणकारी संस्थाएँ विकसित कर ली थीं। स्वतंत्रता के बाद इन्हीं पूर्व–राज्य संस्थाओं को शीघ्रता से राज्य की संस्थाओं में रूपांतरित कर दिया गया।
इससे सत्ता का तीव्र केंद्रीकरण संभव हुआ, लेकिन साथ ही राज्य की संस्थाएँ एक विशिष्ट जातीय–राष्ट्रीय परियोजना से जुड़ गईं। नागरिकता, भूमि नीति और आव्रजन क़ानून यहूदी राष्ट्रत्व को बनाए रखने के लक्ष्य से निर्धारित हुए।
संघर्ष, नागरिकता और राज्य संस्थाएँ
इज़राइल में राज्य–निर्माण निरंतर संघर्ष की स्थिति में हुआ। सीमाएँ, सुरक्षा और राष्ट्रीय पहचान जैसे प्रश्न कभी पूरी तरह सुलझ नहीं पाए। इसके परिणामस्वरूप—
- आपातकालीन क़ानून स्थायी रूप ले गए
- सेना की भूमिका राज्य–संस्थाओं में अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो गई
- नागरिकता जातीय–राष्ट्रीय आधार पर भेदित हो गई
यद्यपि इज़राइल में चुनाव और न्यायपालिका जैसी लोकतांत्रिक संस्थाएँ मौजूद हैं, वे एक ऐसे ढाँचे में कार्य करती हैं जहाँ सुरक्षा और यहूदी पहचान को प्राथमिकता दी जाती है।
भारत और इज़राइल में राज्य–निर्माण: एक तुलना
तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो—
- भारत में राज्य–निर्माण संवैधानिकता और समावेशन पर आधारित रहा; इज़राइल में सुरक्षा और राष्ट्रत्व पर
- भारत ने औपनिवेशिक संस्थाओं को लोकतांत्रिक बनाया; इज़राइल ने संघर्ष और लामबंदी के माध्यम से संस्थाएँ निर्मित कीं
- भारत ने नागरिकता की नागरिक–आधारित अवधारणा अपनाई; इज़राइल में नागरिकता अधिक भेदित रही
ये अंतर दोनों देशों की राज्य संरचनाओं और संस्थागत व्यवहार को समझने में सहायक हैं।
राज्य संरचना और संस्थाओं पर प्रभाव
राज्य–निर्माण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि आज भी शासन को प्रभावित करती है। भारत में मज़बूत संवैधानिक संस्थाओं के साथ-साथ केंद्रीकरण और विविधता से जुड़ी चुनौतियाँ बनी रहती हैं। इज़राइल में लोकतांत्रिक संस्थाओं के साथ आपात शक्तियाँ और सुरक्षा–केंद्रित शासन सह–अस्तित्व में हैं।
निष्कर्ष
भारत और इज़राइल का राज्य–निर्माण दो भिन्न ऐतिहासिक मार्गों का प्रतिनिधित्व करता है। भारत का आधुनिक राज्य औपनिवेशिक संस्थाओं के लोकतांत्रिक रूपांतरण से निकला, जिससे एक संवैधानिक और बहुलतावादी ढाँचा विकसित हुआ। इसके विपरीत, इज़राइल का राज्य संघर्ष, बसावादी राष्ट्रवाद और तीव्र संस्थागत सुदृढ़ीकरण के माध्यम से उभरा, जिससे एक सशक्त लेकिन सुरक्षा–प्रधान राज्य बना।
ये भिन्नताएँ यह स्पष्ट करती हैं कि राज्य संरचनाएँ और संस्थाएँ ऐतिहासिक रूप से निर्मित और राजनीतिक रूप से विवादित होती हैं। इसलिए भारत और इज़राइल के राज्य–निर्माण का तुलनात्मक अध्ययन लोकतंत्र, सत्ता और नागरिकता की प्रकृति को समझने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
संदर्भ (References)
- Kohli, Atul. State-Directed Development
- Khilnani, Sunil. The Idea of India
- Migdal, Joel. Strong Societies and Weak States
- Shindler, Colin. A History of Modern Israel
- Chatterjee, Partha. The Nation and Its Fragments