राज्य का अध्ययन – अवधारणा, परिभाषा और बहस
(Studying the State – Concept, Definition and Debate)
राज्य (State) राजनीतिक विज्ञान की सबसे केंद्रीय लेकिन साथ ही सबसे अधिक विवादित अवधारणाओं में से एक है। आधुनिक राजनीतिक जीवन में राज्य की सर्वव्यापकता के बावजूद, इसे सटीक रूप से परिभाषित करना आसान नहीं है। राज्य न तो केवल संस्थाओं का समूह है, न ही मात्र कानूनी सत्ता, और न ही केवल दमन का उपकरण। बल्कि राज्य को सबसे बेहतर रूप में एक ऐतिहासिक रूप से निर्मित, सामाजिक रूप से निहित और वैचारिक रूप से जटिल संरचना के रूप में समझा जा सकता है।
यह इकाई राज्य के अध्ययन से जुड़ी प्रमुख अवधारणाओं, परिभाषाओं और बहसों का विश्लेषण करती है, विशेष रूप से राज्य एक विचार के रूप में और राज्य एक व्यवहारिक संरचना के रूप में—इन दोनों के बीच के तनाव को समझते हुए।
राज्य को परिभाषित करने की समस्या
पहली दृष्टि में राज्य एक स्पष्ट सत्ता प्रतीत होता है—उसके पास क्षेत्र होता है, वह क़ानून बनाता है, कर वसूलता है और जनता पर अधिकार का दावा करता है। किंतु राजनीतिक विचारकों का तर्क है कि राज्य को केवल इन कार्यों तक सीमित नहीं किया जा सकता। समस्या यह है कि राज्य एक साथ दृश्य और अदृश्य दोनों होता है।
एक ओर वह नौकरशाही, पुलिस, न्यायालय और सेना जैसी ठोस संस्थाओं के माध्यम से कार्य करता है, दूसरी ओर वह एक अमूर्त सत्ता के रूप में मौजूद रहता है—जिसे वैध, संप्रभु और निरपेक्ष माना जाता है। यही दोहरी प्रकृति राज्य को विश्लेषण की दृष्टि से जटिल बनाती है।
यदि हम राज्य को केवल कानूनी या संस्थागत ढाँचे के रूप में देखें, तो उसके वैचारिक और सामाजिक आयाम छूट जाते हैं। और यदि हम उसे केवल एक विचार मानें, तो उसकी भौतिक और दमनकारी शक्तियों की अनदेखी हो जाती है। इसलिए राज्य के अध्ययन के लिए एक आलोचनात्मक और संबंधपरक दृष्टिकोण आवश्यक है।
शास्त्रीय परिभाषा: मैक्स वेबर और वैध हिंसा का एकाधिकार
आधुनिक राज्य की सबसे प्रभावशाली परिभाषाओं में से एक Max Weber ने दी। वेबर के अनुसार, राज्य वह मानवीय समुदाय है जो किसी निश्चित क्षेत्र में वैध भौतिक हिंसा के प्रयोग पर एकाधिकार का सफल दावा करता है।
इस परिभाषा में तीन प्रमुख तत्व हैं—क्षेत्र, वैधता और दमनात्मक शक्ति। वेबर के अनुसार, राज्य को विशिष्ट बनाने वाली बात हिंसा का प्रयोग नहीं, बल्कि हिंसा की वैधता है। जनता का यह विश्वास कि राज्य द्वारा प्रयुक्त बल उचित है, राज्य की सत्ता की नींव बनता है।
हालाँकि आलोचकों का कहना है कि वेबर की परिभाषा औपचारिक सत्ता पर अधिक ज़ोर देती है और उपनिवेशवादी या उत्तर–औपनिवेशिक समाजों में मौजूद असमान वैधता और अनौपचारिक सत्ता-संरचनाओं को पूरी तरह नहीं समझा पाती।
उपकरण के रूप में राज्य: मार्क्सवादी दृष्टिकोण
मार्क्सवादी सिद्धांत राज्य को एक तटस्थ संस्था मानने से इंकार करते हैं। उनके अनुसार राज्य वर्ग-संबंधों और पूँजीवादी समाज की संरचना से गहराई से जुड़ा होता है। शास्त्रीय मार्क्सवाद में राज्य को शासक वर्ग का उपकरण माना गया, जो निजी संपत्ति की रक्षा करता है और पूँजी संचय की परिस्थितियाँ बनाए रखता है।
बाद के मार्क्सवादी विचारकों ने इस दृष्टि को जटिल बनाया। Nicos Poulantzas ने राज्य की सापेक्ष स्वायत्तता की अवधारणा प्रस्तुत की। उनके अनुसार, राज्य सीधे-सीधे शासक वर्ग के आदेशों का पालन नहीं करता, बल्कि विभिन्न वर्गों के बीच मध्यस्थता करके पूँजीवादी व्यवस्था को स्थिर बनाए रखता है।
इसके विपरीत, Ralph Miliband ने राज्य के भीतर मौजूद अभिजात वर्ग की सामाजिक पृष्ठभूमि पर ज़ोर देते हुए तर्क दिया कि वर्ग-सत्ता राज्य कर्मियों और नेटवर्कों के माध्यम से काम करती है।
ये बहसें दिखाती हैं कि राज्य न तो पूरी तरह स्वतंत्र इकाई है और न ही केवल एक यांत्रिक उपकरण—वह संघर्ष का स्थल है।
विचार के रूप में राज्य: फिलिप एब्रैम्स की आलोचना
राज्य-सिद्धांत में एक बड़ा वैचारिक मोड़ Philip Abrams के कार्य से आता है। एब्रैम्स का तर्क है कि राज्य को एक वास्तविक, एकीकृत इकाई मानना भ्रामक है। उनके अनुसार, “राज्य” एक वैचारिक निर्माण है, जो शासन की बिखरी और विरोधाभासी प्रक्रियाओं को छिपा देता है।
उन्होंने राज्य-प्रणाली (वास्तविक प्रशासनिक और दमनकारी संस्थाएँ) और राज्य-विचार (एकता, वैधता और अधिकार का प्रतीकात्मक चित्रण) के बीच भेद किया। राज्य की शक्ति इसी भ्रम में निहित है कि वह एक संगठित और तटस्थ इकाई है।
यह दृष्टिकोण हमें राज्य को एक पूर्व-निर्धारित वस्तु मानने के बजाय, उसे विमर्श, प्रतीकों और दैनिक प्रथाओं के माध्यम से निर्मित होते हुए देखने के लिए प्रेरित करता है।
समाज के भीतर राज्य: जोएल मिग्डल का दृष्टिकोण
Joel Migdal ने State-in-Society दृष्टिकोण विकसित किया, जो राज्य और समाज के बीच स्पष्ट सीमा को नकारता है। उनके अनुसार, राज्य निरंतर सामाजिक समूहों, स्थानीय सत्ता-संरचनाओं और अनौपचारिक मानदंडों से प्रभावित होता रहता है।
राज्य की नीतियाँ जमीनी स्तर पर हमेशा सफल नहीं होतीं; अधिकारी अक्सर समझौते करते हैं या नियंत्रण खो देते हैं। इसलिए राज्य की क्षमता हर क्षेत्र और हर सामाजिक संदर्भ में समान नहीं होती। यह दृष्टिकोण विशेष रूप से उत्तर–औपनिवेशिक समाजों को समझने में उपयोगी है।
“राज्य की तरह देखना”: जेम्स सी. स्कॉट
James C. Scott ने यह विश्लेषण किया कि राज्य समाज को “पठनीय” (legible) बनाने का प्रयास कैसे करता है। जनगणना, मानचित्रण, भूमि सर्वेक्षण और मानकीकरण जैसी प्रक्रियाओं के माध्यम से राज्य सामाजिक जटिलताओं को सरल बनाता है ताकि शासन संभव हो सके।
स्कॉट का तर्क है कि जब यह दृष्टि अधिनायकवादी सत्ता और उच्च-आधुनिकतावादी विचारधारा से जुड़ जाती है, तो नीतिगत विफलताएँ और सामाजिक प्रतिरोध उत्पन्न होते हैं। यह विश्लेषण राज्य के ज्ञान की सीमाओं को उजागर करता है।
उत्तर–औपनिवेशिक आलोचनाएँ और वैधता का प्रश्न
उत्तर–औपनिवेशिक विद्वानों ने दिखाया है कि आधुनिक राज्य का स्वरूप औपनिवेशिक शासन से गहराई से प्रभावित है। Partha Chatterjee और Hamza Alavi के अनुसार, उत्तर–औपनिवेशिक राज्य अक्सर लोकतांत्रिक दावों और औपनिवेशिक दमनकारी संरचनाओं का मिश्रण होता है।
इन समाजों में राज्य की वैधता खंडित होती है और शासन अपवादात्मक उपायों तथा अनौपचारिक समझौतों के माध्यम से संचालित होता है।
राज्य का अध्ययन कठिन क्यों है?
उपरोक्त बहसें स्पष्ट करती हैं कि राज्य एक साथ संस्था, प्रक्रिया, विचार और व्यवहार—सब कुछ है। वह एकीकृत दिखाई देता है, लेकिन व्यवहार में बिखरा होता है; तटस्थता का दावा करता है, लेकिन सत्ता-संबंधों में निहित होता है।
Ashis Nandy के अनुसार, आधुनिक राज्य व्यक्तित्वों और राजनीतिक कल्पनाओं को भी गढ़ता है। इसलिए राज्य को समझना केवल संरचनाओं को समझना नहीं, बल्कि यह देखना भी है कि वह कैसे अनुभव किया जाता है और कैसे चुनौती दी जाती है।
निष्कर्ष: राज्य को एक गतिशील और विवादित संरचना के रूप में समझना
यह इकाई दर्शाती है कि राज्य को किसी एक परिभाषा में नहीं बाँधा जा सकता। वेबर की वैध हिंसा की अवधारणा, मार्क्सवादी वर्ग-विश्लेषण, एब्रैम्स की वैचारिक आलोचना और समाज–राज्य दृष्टिकोण—सभी राज्य के अलग-अलग पहलुओं को उजागर करते हैं।
तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य में आधुनिक राज्य का अध्ययन हमें यह समझने में मदद करता है कि राज्य ऐतिहासिक रूप से विशिष्ट, सामाजिक रूप से निहित और निरंतर परिवर्तनशील है। इसलिए राज्य के बारे में प्रश्न केवल “राज्य क्या है?” नहीं, बल्कि “राज्य कैसे निर्मित होता है, किसके हितों की सेवा करता है और उसका प्रतिरोध कैसे होता है?” भी होने चाहिए।
संदर्भ (References)
- Weber, Max. Politics as a Vocation
- Abrams, Philip. “Notes on the Difficulty of Studying the State”
- Miliband, Ralph. The State in Capitalist Society
- Poulantzas, Nicos. State, Power, Socialism
- Migdal, Joel. State in Society
- Scott, James C. Seeing Like a State
- Chatterjee, Partha. The Politics of the Governed