समानता किसकी? : कल्याण, संसाधन और क्षमता
परिचय (Introduction)
आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत में समानता (equality) को एक मूलभूत नैतिक और राजनीतिक मूल्य माना जाता है, लेकिन इसके बावजूद यह प्रश्न अत्यंत विवादास्पद रहा है कि समानता आखिर किसकी होनी चाहिए। इसी बुनियादी प्रश्न को अमर्त्य सेन (Amartya Sen) ने प्रसिद्ध रूप से “Equality of What?” के रूप में प्रस्तुत किया। सेन का तर्क था कि अधिकांश समानतावादी सिद्धांत इस बात पर सहमत हैं कि समाज में समानता होनी चाहिए, लेकिन वे इस बात पर असहमत हैं कि किस चीज़ को समान किया जाए।

क्या न्यायपूर्ण समाज वह है जहाँ लोगों का कल्याण (welfare) समान हो, या जहाँ सभी के पास समान संसाधन (resources) हों, या फिर वह जहाँ सभी को अपने जीवन को जीने की समान वास्तविक स्वतंत्रता (capability) प्राप्त हो? यह बहस Debates in Political Theory का एक केंद्रीय विषय है और DU MA Political Science के पाठ्यक्रम में इसकी विशेष अकादमिक महत्ता है।
राजनीतिक सिद्धांत में समानता : वैचारिक पृष्ठभूमि
समानता का विचार प्राचीन काल से राजनीतिक चिंतन का हिस्सा रहा है, लेकिन आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत में इसका संबंध मुख्यतः वितरणात्मक न्याय (distributive justice) से जुड़ा हुआ है। उदारवाद (liberalism), समाजवाद (socialism) और कल्याण अर्थशास्त्र (welfare economics) — सभी समानता का समर्थन करते हैं, लेकिन अलग-अलग अर्थों में।
शुरुआती सिद्धांतों में समानता को अक्सर समान व्यवहार या समान परिणाम के रूप में समझा गया। धीरे-धीरे यह स्पष्ट हुआ कि समान व्यवहार हमेशा न्यायपूर्ण नहीं होता, क्योंकि व्यक्ति सामाजिक, आर्थिक और प्राकृतिक रूप से असमान परिस्थितियों में जन्म लेते हैं। इसी बिंदु से “समानता किसकी?” की बहस ने राजनीतिक सिद्धांत में एक केंद्रीय स्थान प्राप्त किया।
कल्याण की समानता (Equality of Welfare)
समानता की एक प्रमुख अवधारणा है कल्याण की समानता (equality of welfare)। इस दृष्टिकोण के अनुसार एक न्यायपूर्ण समाज वह है जहाँ सभी व्यक्तियों का कल्याण या सुख (well-being / happiness) समान हो। यह विचार उपयोगितावाद (utilitarianism) और कल्याण अर्थशास्त्र से जुड़ा हुआ है।
इस दृष्टिकोण के समर्थकों का मानना है कि संसाधन और अधिकार अपने आप में मूल्यवान नहीं हैं, बल्कि इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे मानव कल्याण को बढ़ाते हैं। यदि सभी लोग समान रूप से संतुष्ट या खुश हैं, तो आय या संसाधनों की असमानता को नैतिक रूप से गलत नहीं माना जाना चाहिए।
लेकिन अमर्त्य सेन ने इस दृष्टिकोण की तीखी आलोचना की। उनका तर्क है कि कल्याण व्यक्तिपरक (subjective) होता है और लोग अपनी गरीबी या दमन की स्थिति के अनुसार अपनी अपेक्षाओं को कम कर लेते हैं, जिसे वे adaptive preferences कहते हैं। इस स्थिति में अत्यधिक वंचित लोग भी संतुष्ट दिख सकते हैं, जिससे वास्तविक अन्याय छिप जाता है।
संसाधनों की समानता (Equality of Resources)
कल्याण आधारित दृष्टिकोण के विकल्प के रूप में संसाधनों की समानता (equality of resources) का सिद्धांत सामने आया, जिसे विशेष रूप से Ronald Dworkin ने विकसित किया। इस दृष्टिकोण के अनुसार न्याय की मांग यह है कि सभी व्यक्तियों को समान संसाधन उपलब्ध हों, ताकि वे अपने-अपने जीवन लक्ष्यों को स्वतंत्र रूप से चुन सकें।
ड्वर्किन choice और circumstance के बीच अंतर करते हैं। उनके अनुसार व्यक्ति को अपने स्वैच्छिक निर्णयों के परिणामों की जिम्मेदारी स्वयं उठानी चाहिए, लेकिन जन्म, बीमारी, या सामाजिक पृष्ठभूमि जैसी परिस्थितियों से उत्पन्न असमानताओं की भरपाई समाज को करनी चाहिए।
हालाँकि, इस सिद्धांत की भी सीमाएँ हैं। आलोचकों का कहना है कि समान संसाधन होने के बावजूद लोग उन्हें समान रूप से उपयोग करने में सक्षम नहीं होते। उदाहरण के लिए, दिव्यांग व्यक्ति को समान जीवन स्तर प्राप्त करने के लिए अधिक संसाधनों की आवश्यकता हो सकती है। इस प्रकार संसाधन समानता वास्तविक अवसरों की समानता सुनिश्चित नहीं कर पाती।
क्षमता की समानता (Equality of Capability)
इन दोनों दृष्टिकोणों की सीमाओं को ध्यान में रखते हुए अमर्त्य सेन ने क्षमता दृष्टिकोण (capability approach) प्रस्तुत किया। सेन के अनुसार समानता का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि लोग वास्तव में क्या करने और क्या बनने में सक्षम हैं, न कि केवल उनके पास कितना सुख या कितने संसाधन हैं।
क्षमताएँ (capabilities) उन वास्तविक स्वतंत्रताओं को दर्शाती हैं जिनके माध्यम से व्यक्ति कार्य-स्थितियाँ (functionings) प्राप्त करता है, जैसे स्वस्थ रहना, शिक्षा प्राप्त करना, राजनीतिक भागीदारी करना और सामाजिक सम्मान के साथ जीवन जीना।
सेन यह स्पष्ट करते हैं कि समान आय या संसाधन होने के बावजूद व्यक्तियों की क्षमताएँ भिन्न हो सकती हैं, क्योंकि स्वास्थ्य, लिंग, सामाजिक नियम और राजनीतिक परिस्थितियाँ व्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित करती हैं। इसलिए क्षमता की समानता अधिक व्यापक और यथार्थवादी अवधारणा प्रस्तुत करती है।
तुलनात्मक विश्लेषण : कल्याण, संसाधन और क्षमता
यदि इन तीनों दृष्टिकोणों की तुलना की जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि प्रत्येक समानता को अलग-अलग दृष्टि से देखता है। कल्याण की समानता व्यक्ति की संतुष्टि पर ज़ोर देती है, संसाधनों की समानता साधनों की निष्पक्षता पर, जबकि क्षमता की समानता वास्तविक स्वतंत्रता पर केंद्रित होती है।
कल्याण आधारित दृष्टिकोण सामाजिक अन्याय को छिपा सकता है, संसाधन आधारित दृष्टिकोण व्यक्तिगत भिन्नताओं को पूरी तरह नहीं समझ पाता, जबकि क्षमता दृष्टिकोण इन दोनों कमियों को दूर करने का प्रयास करता है। हालांकि, क्षमता दृष्टिकोण की खुली प्रकृति इसे मापने और लागू करने में जटिल बनाती है।
आलोचना और प्रत्यालोचना
क्षमता दृष्टिकोण की सबसे प्रमुख आलोचना यह है कि अमर्त्य सेन ने क्षमताओं की कोई निश्चित सूची नहीं दी। इससे नीति-निर्माण में अस्पष्टता पैदा होती है। कुछ विद्वानों का यह भी कहना है कि यह दृष्टिकोण अत्यधिक नैतिक निर्णयों पर निर्भर करता है।
इसके उत्तर में सेन का तर्क है कि क्षमताओं की सूची दार्शनिकों द्वारा तय नहीं की जानी चाहिए, बल्कि लोकतांत्रिक सार्वजनिक विमर्श (public reasoning) के माध्यम से समाज को स्वयं यह निर्णय लेना चाहिए कि उसके लिए कौन-सी क्षमताएँ महत्वपूर्ण हैं। यही प्रक्रिया स्वयं में स्वतंत्रता का अभ्यास है।
समकालीन प्रासंगिकता (Contemporary Relevance)
आज की दुनिया में गरीबी, लैंगिक असमानता, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी समस्याओं को केवल आय या संसाधनों के आधार पर नहीं समझा जा सकता। इसी कारण Human Development Index (HDI) जैसे सूचकांक क्षमता दृष्टिकोण से प्रेरित हैं।
राजनीतिक सिद्धांत में यह बहस समानता, सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों को समझने के लिए अत्यंत प्रासंगिक बनी हुई है।
निष्कर्ष (Conclusion)
“Equality of What?” की बहस यह स्पष्ट करती है कि समानता एक सरल या एक-आयामी अवधारणा नहीं है। कल्याण और संसाधन दोनों महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे मानव स्वतंत्रता की पूरी तस्वीर प्रस्तुत नहीं कर पाते। अमर्त्य सेन का क्षमता दृष्टिकोण समानता को वास्तविक स्वतंत्रताओं के विस्तार के रूप में समझकर राजनीतिक सिद्धांत को अधिक मानवीय और न्यायसंगत आधार प्रदान करता है।