निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन
निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन (Delimitation of Constituencies) लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की एक केंद्रीय प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य जनसंख्या और प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन स्थापित करना होता है। लोकतांत्रिक सिद्धांत के अनुसार परिसीमन का लक्ष्य “एक व्यक्ति, एक मत, एक मूल्य” के सिद्धांत को सुनिश्चित करना है।
परंतु जम्मू और कश्मीर के संदर्भ में परिसीमन कभी भी केवल एक तकनीकी या प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रहा। यह प्रक्रिया यहाँ राजनीतिक, क्षेत्रीय, पहचान-आधारित और संवैधानिक विवादों से गहराई से जुड़ी रही है।
इसी कारण परिसीमन को अक्सर निष्पक्ष प्रतिनिधित्व के साधन के बजाय सत्ता-संतुलन को प्रभावित करने वाले राजनीतिक हस्तक्षेप के रूप में देखा गया है।
परिसीमन की अवधारणा और लोकतांत्रिक उद्देश्य
परिसीमन का मूल उद्देश्य निम्नलिखित है—
- विभिन्न क्षेत्रों को समान और न्यायसंगत प्रतिनिधित्व देना
- जनसंख्या में हुए परिवर्तनों को प्रतिबिंबित करना
- किसी क्षेत्र की अति-प्रतिनिधित्व या न्यून-प्रतिनिधित्व की स्थिति को सुधारना
- चुनावी लोकतंत्र की विश्वसनीयता बढ़ाना
लोकतांत्रिक व्यवस्था में परिसीमन आयोगों को स्वायत्त और निष्पक्ष संस्थाएँ माना जाता है। उनकी वैधता पारदर्शिता, निष्पक्षता और जन-विश्वास पर आधारित होती है।
जम्मू और कश्मीर में, हालांकि, ऐतिहासिक परिस्थितियों और राजनीतिक संदर्भों ने इस प्रक्रिया को विवादास्पद बना दिया।
जम्मू और कश्मीर में परिसीमन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
अन्य भारतीय राज्यों के विपरीत, जम्मू और कश्मीर में परिसीमन की प्रक्रिया विशिष्ट संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत संचालित होती रही। राज्य की विशेष स्थिति के कारण—
- परिसीमन राष्ट्रीय प्रक्रिया से स्वतः जुड़ा नहीं था
- यह राज्य के अपने क़ानूनों और संस्थाओं द्वारा नियंत्रित होता था
राजनीतिक अस्थिरता, संघर्ष और संवेदनशीलता के कारण परिसीमन की प्रक्रिया लंबे समय तक स्थगित या सीमित रही। इससे निर्वाचन क्षेत्रों की संरचना वर्षों तक अपरिवर्तित बनी रही और प्रतिनिधित्व की असमानताओं पर बहस तेज़ होती गई।
जनसंख्या बनाम क्षेत्रीय संतुलन
परिसीमन से जुड़ा सबसे बड़ा विवाद जनसंख्या और क्षेत्रीय संतुलन के बीच रहा है।
लोकतांत्रिक सिद्धांत जनसंख्या को प्राथमिक मानदंड मानता है, परंतु जम्मू और कश्मीर की भौगोलिक और सामाजिक संरचना—कश्मीर घाटी, जम्मू क्षेत्र और लद्दाख—इस सिद्धांत को जटिल बना देती है।
आलोचकों का तर्क है कि केवल जनसंख्या के आधार पर परिसीमन करने से—
- भौगोलिक रूप से विशाल लेकिन कम जनसंख्या वाले क्षेत्रों की उपेक्षा होती है
- ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विशिष्टताओं की अनदेखी होती है
- क्षेत्रीय असंतोष बढ़ता है
दूसरी ओर, समर्थक मानते हैं कि जनसंख्या से विचलन मत की समानता के सिद्धांत को कमजोर करता है।
क्षेत्रीय राजनीति और शक्ति-संतुलन
परिसीमन का सीधा प्रभाव क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन पर पड़ता है। निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या और सीमाएँ तय करती हैं—
- किस क्षेत्र को कितने प्रतिनिधि मिलेंगे
- कौन-से राजनीतिक दल लाभ या हानि में रहेंगे
- सरकार गठन की संभावनाएँ
इसी कारण जम्मू और कश्मीर में परिसीमन को अक्सर शून्य-योग राजनीति के रूप में देखा गया, जहाँ एक क्षेत्र का लाभ दूसरे के नुकसान के रूप में समझा गया।
परिसीमन और चुनावी वैधता
चुनावों की वैधता इस बात पर निर्भर करती है कि प्रतिनिधित्व को न्यायपूर्ण और संतुलित माना जाए। जब परिसीमन को पक्षपातपूर्ण समझा जाता है, तो—
- चुनावों की निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न होता है
- निर्वाचित संस्थाओं की विश्वसनीयता घटती है
- लोकतांत्रिक भागीदारी कमजोर होती है
जम्मू और कश्मीर में परिसीमन से जुड़ा अविश्वास चुनावी राजनीति के प्रति व्यापक संदेह का हिस्सा बन गया।
पहचान, प्रतिनिधित्व और परिसीमन
निर्वाचन क्षेत्र केवल प्रशासनिक इकाइयाँ नहीं होते; वे राजनीतिक पहचान के स्थल भी होते हैं।
धर्म, भाषा, क्षेत्र और संस्कृति से जुड़ी पहचानों के कारण परिसीमन को अक्सर—
- पहचान के पुनर्गठन
- राजनीतिक प्रभाव के पुनर्वितरण
के रूप में देखा गया।
इसने परिसीमन को तकनीकी प्रक्रिया से बदलकर राजनीतिक पहचान के संघर्ष का माध्यम बना दिया।
परिसीमन आयोग की भूमिका
परिसीमन आयोगों का दायित्व रहा है कि वे—
- संवैधानिक सिद्धांतों
- प्रशासनिक व्यावहारिकता
- और सामाजिक–राजनीतिक संवेदनशीलता
के बीच संतुलन बनाएँ।
किन्तु जब आयोगों की स्वायत्तता या पारदर्शिता पर प्रश्न उठे, तो उनके निर्णयों को व्यापक स्वीकृति नहीं मिल सकी।
संघवाद और विश्वास का संकट
परिसीमन की बहसें एक गहरे संघीय विश्वास-संकट को भी उजागर करती हैं। राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य में प्रतिनिधित्व की संरचना में कोई भी परिवर्तन—
- केंद्रीय हस्तक्षेप
- स्वायत्तता के क्षरण
- और थोपे गए निर्णय
के रूप में देखा जा सकता है।
इससे परिसीमन लोकतांत्रिक सुधार की बजाय संघीय तनाव का कारण बन जाता है।
संघर्षग्रस्त समाज में परिसीमन की चुनौतियाँ
संघर्ष की परिस्थितियों में परिसीमन अतिरिक्त कठिन हो जाता है—
- विस्थापन और पलायन से जनसंख्या आँकड़े प्रभावित होते हैं
- सुरक्षा कारणों से जन-परामर्श सीमित होता है
- राजनीतिक ध्रुवीकरण सहमति निर्माण को कठिन बनाता है
इन परिस्थितियों में परिसीमन को पूर्णतः निष्पक्ष और सर्वमान्य बनाना एक बड़ी चुनौती है।
लोकतांत्रिक तर्क और राजनीतिक धारणा
जम्मू और कश्मीर में परिसीमन की मूल समस्या यह रही है कि—
- संवैधानिक तर्क इसे लोकतांत्रिक सुधार मानता है
- जबकि राजनीतिक धारणा इसे नियंत्रण और प्रभुत्व के साधन के रूप में देखती है
यह अंतर परिसीमन की वैधता को कमजोर करता है।
निष्कर्ष
जम्मू और कश्मीर में निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन यह स्पष्ट करता है कि तकनीकी संवैधानिक प्रक्रियाएँ अपने आप में लोकतांत्रिक समाधान नहीं होतीं। प्रतिनिधित्व तभी वैध और प्रभावी बनता है, जब वह विश्वास, पारदर्शिता और व्यापक सहमति पर आधारित हो।
यहाँ परिसीमन को अक्सर लोकतंत्र के सुदृढ़ीकरण के बजाय राजनीतिक शक्ति के पुनर्वितरण के रूप में देखा गया, जिसने चुनावों और प्रतिनिधि संस्थाओं के प्रति संदेह को और गहरा किया।
जम्मू और कश्मीर का अनुभव यह सिखाता है कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की सफलता केवल क़ानूनी शुद्धता पर नहीं, बल्कि इस बात पर निर्भर करती है कि वे सामाजिक स्वीकृति और राजनीतिक भरोसे के साथ कितनी गहराई से जुड़ी हैं।
संदर्भ (References)
- Bose, Sumantra. Kashmir: Roots of Conflict, Paths to Peace
- Schofield, Victoria. Kashmir in Conflict
- Noorani, A.G. Article 370: A Constitutional History of Jammu and Kashmir
- Weiner, Myron. The Indian Paradox
- निर्वाचन आयोग की परिसीमन संबंधी रिपोर्टें